पहिली सी ‘हि’ मोहब्बत

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तुझसे पहली सी मोहब्बत ही तो है,

मायूस न हो मेरे महबूब। 

थोड़ा सा वक्त ही तो गुजरा है,

चहरे का बस नूर ही तो बदला है।

पर आज भी वही है तेरे नाम की हिना,

बस हाथो से बालो में उतर आयी है।

आज भी हर बार जब दिल धड़कता है,

सास तो तेरे नाम की ही लेता है।

डोरे जरूर डाले कई चेहरों ने

रूबरू भी हुआ शान ओ शौकत से । 

पर रूह से जिस तरह बांधा तूने,

तो कैसे कह देता ‘मुझसे पहली सी मोहब्बत न मांग’।

खाएं या न खाएं

Man resisting temptation to eat dessert

एक होड़ लगी थी की कौन कितना खा सकता है,
असल में मायने ये रखता था की कौन कितना पचा सकता है।
सबकी देखा देखी मै भी हो गया इस होड़ में शामिल,
ये समझे बिना की मन की चाहत पर तन कैसे करे तामिल।
मन की भूख के दम पर मै खाये जा रहा था,
मुझे देखकर मेरे चेले चपाटे भी खा रहे थे।
भरोसा था सभी को अपनी अपनी भूख पर,
हम कोई पहली बार थोड़े ही खा रहे थे। 
होड़ की शर्त ये थी की खाया हुआ पचना चाहिए,
अजीर्ण चाहे जितना भी हो पर नामोनिशान नहीं दिखना चाहिए।
पर धीरे धीरे सबका पेट फुलने लगा,
हर कोई एक दूसरे को शक की नज़र से घूरने लगा।
अजीर्ण के मारे सभी का जी मचलने लगा,
तभी एक पहलवान उलटी करने लगा।
उसी देख फिर हर कोई उगलने लगा,
जो छिपा रखा था वो बाहर निकलने लगा ।
सपने से जागा तो मै पसीने में सराबोर बैठा था,
राहत के अहसास के बीच एक प्रश्न मेरे सम्मुख खड़ा था।
ऐसी परिस्थिति आ जाये तो क्या करना है ?
खाने के बाद नहीं, सिर्फ खाने से पहले सोचना है ।

पन्ने और किताब

मत बनो महज एक पन्ना,

बनना ही है कुछ तो पूरी किताब बनो ।

पन्नो का कोई वजूद नहीं होता,

सिर्फ एक कागज और थोड़ी सी स्याही। 

हा नजर वो जरूर पहले आते है,

किताबो को बनने में समय जो लगता है। 

पन्ने मोहताज होते है हवाओ के रुख के

लोग ये अक्सर भूल जाते है।

उड़ते वक्त जो दिखते है बाज

जमींन पर वो बौने नजर आते है।

किताबे उड़ना नहीं, सर उठाना सिखाती है,

और गाड़े भी रखती है पैरो को जमींन पर।

कल और आज

कल जब मै निकल पड़ता था
तलाश में अनजानी ख्वाहिशो के
मुस्कुरा देता था दीदार ऐ चाँद पर
मायूस भी हो जाता उसके न निकलने पर
फिर संभाल लेता अपने आप को
सोच कर की समय ही तो है
रुकेगा थोड़े, फिर कल रात होगी
पहेलियों को बनाता और बुझाता
मै चलता रहा हाथ थामे समय का
आज थकने लगे है पैर मेरे
पर दिल और दिमाग कहा रुकते है
चलते ही रहते है हर घडी अथक
तलाश में नयी ख्वाहिशो के
पर अब नहीं घबराता मै बादलो से
अमावस के सच को भी जानता हु
ये छिपा भर सकते है कुछ देर के लिए
पर मिटा नहीं पाते चाँद को कभी
उल्टा टूट कर बरसते तो बादल ही है
चाँद तो अडिग है ज्यों की त्यों
सराबोर शुभ्र मद्धम रोशनी में

यार बस मै और तुम

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बहोत कुछ होता है हर किसी का हर किसी के साथ,
बीवी, बच्चे, भाई, बहन और माँ बाप के साथ,
पर होता है जिंदगी का कुछ हिस्सा ऐसा भी ,
जिसको बाटा होता है बस कुछ खास दोस्तों के साथ।
बनते बनते कभी बेटा, तो कभी बाप, तो कभी पति,
भूल जाते है हम अपने आप ही को।
हर किसी को दे देने के बाद उनका हिस्सा,
कभी ख्वाहिश होती है अपने उस हिस्से की।
मिल लिया करो यारो लिये अपने उन खास हिस्सों को,
भूलकर सब कुछ की ‘कौन’ और ‘क्या’ है हम।
बाटने को खुशिया और ज़माने को रौब तो हज़ारो मिल जायेंगे,
हसते हसते रो सको जिसके साथ वो दोस्त कहा से लाएंगे ।
वक्त न रुका है, न रुकेगा कभी,
वो स्कूल, वो गलिया, वो नुक्कड़, सब वही ठहरे होंगे जहा थे वही।
पैसा भी होगा, होगा कारोबार भी, शोहरत भी होगी शायद
बस नहीं होंगे कल तो, यार बस मै और तुम।
वसंत बंग
पुणे, सप्टेंबर ६, २०२४

तू खुदा है भी या नही?

विश्वास कर लेता हू ये सोचकर,
कभी तो तू इंसाफ करेगा.
पर माफ नही कर पाऊंगा,
भरोसा जब कभी ये टूटेगा.
हर दर्द को सह जाता हू ये सोचकर
कि शायद सजा होगी किन्ही अनदेखे गुनाहों की
पर तभी सवाल कौंध जाता है मेरे मन मे,
उनका क्या जो सरेआम गुनाह किये जाते है.
सोचता होगा तू शायद कि क्या हि कर लूंगा मै,
इंसान जो समझता है तू मुझे.
भूल जाता है तू शायद कि तेरे खुदा होने के लिये
जरुरी है हम इबादत करने वालो का होना.
बहोत आसान है तेरा मुझसे सवाल करना,
कि क्या भरोसा नही है मुझपे.
पर थक कर मै भी आज पुछता हू,
तू खुदा है भी या नही?

क्या महसूस करना है?

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सुनकर बलात्कार की वारदातों को,
कभी जन आक्रोश उमड़ पड़ता था ।
क्या वो अनपढ़ो का सैलाब था
जो न पूछता था बलात्कारी का जाती और धर्म।
आज हर कोई ज्ञान से भरा है लबालब,
व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी के इस दौर में।
नाम सुन कर तय करने लगे है,
कुछ बोले भी या न बोले ।
आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में
लिखना बोलना तो छोड़िये
क्या महसूस करना है
ये कहा अब लोग खुद तय करते है।

दुतरफा कल

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जो तू हार जाए कभी तो रो लेना,
महसूस भी करना दर्द को।
पर न टूटने देना हौसलो को,
घोल कर पी जाना शराब समझ कर।
जब पहुंचेगा दर्द रग रग में,
लाएगा उबाल लहू में तेरे।
मिला देगा खाक में उन सभी को,
जिन्होने हराया था तुझे कभी।
आज के नशे में धुत वो भूल चुके होंगे,
कल तो दुतरफा है, एक पीछे और दूसरा आगे।
कल जो इतराते थे तुझे हराकर,
सर झुकाये खड़े होंगे कल ।

तजुर्बो की थकान

कभी न खत्म होनेवाले इम्तेहानों से थककर
एक दिन भाग जाना चाहता था वो रण छोड़कर।
तभी दस्तक दी जिंदगी ने जिम्मेदारियों की गठड़ी लिये,
जगाकर अपराध के बोध को ला खड़ा कर दिया फिर रेस में।
शायद शक था जिंदगी को उसके जिम्मेदार होने पर,
इसीलिए वास्ता दे दिया हर इम्तेहान से मिले तजुर्बो का।
हिम्मत जुटाकर उसने भी एक सवाल कर दिया जिंदगी से,
क्या करू तजुर्बो का ए जिंदगी, जब तू जितने ही नहीं देती।

नास्तिक या आस्तिक ?

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मै जो नास्तिक बन जाऊ तो इल्जाम तेरे सर होंगा,
फरियाद पर फरियाद, और तू है कि दर्द कम ही नहीं करता ।
नाक़बुली के लिए तू गिना सकता है खामियां मेरी,
पर न जो होती खामियां तो क्या मै खुद खुदा नहीं होता?

एक जद्दोजहद सी है मेरी आस्था और तेरी बेरुखी में,
देखते है कौन टूटता है पहले।
पर मुझे हराकर तू कैसे जित पायेगा,
इसी खयाल से हर सुबह फिर आस्तिक बन जाता हु।