रूह का प्यार

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जो छूने को बेताब हो वो रूह का प्यार नहीं,
वो तो बस एक एहसास है किसी के खास होने का।
जो बसा लेते है किसी को अपने दिल में,
बाहर नहीं, उनकी दुनिया होती है खुद अपने भीतर।
वो मोहताज नहीं होते आँखों से देखने के लिए,
न ही जरुरी आवाज का उनकी कानो में पड़ना।
बस उसका होना ही काफी होता है उन्हें सुकून पाने के लिए,
वो भी बाहर कही और नहीं बस अंदर अपने दिल में।
बंदिशे लगायी जा सकती है देखने और सुनने पर,
पर भला कोई रोक पाया है किसी को चाहने से ?
बहोत खुद्दार होता है रूह का प्यार
चलता है सांसो के साथ पर वो भी बस खुद अपनी।
बड़ा सुकून भरा होता है प्यार रूह का,
इसमें पाने की ख्वाइश जो नहीं होती।
जब भी जी चाहे उससे मिलने को,
आईने के सामने खड़े हो जाते है लोग।

दिल और दिमाग

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किसी को इम्तिहानो से गुजरते देख,
लोग सोचते है बहोत तेज है ये।
कौन कहता है हर इम्तिहान मजबूत बनाती है
टूटने का दर्द देखकर भला कही महसूस होता है?
आसान नहीं होता दिल और दिमाग दोनों का बोझ ढोना,
उतार कर फेंका भी तो नहीं जाता किसी एक को।
खुदा का करम मानते है इन दोनों के होने को,
पर कइयों के लिए इससे बड़ा सितम नहीं होता।

पथ

जब कभी गलती से मूड जाता हु पीछे,
यकीं नहीं होता खुद अपने पदचिन्हो पर ।
कुछ चीज़े ऐसी जिसका जादू सर चढ़ कर बोलता था,
और कुछ ऐसी जिसे तवज्जो नहीं देता था मै ।
आज वो जादू कम छलावा ज्यादा लगता है,
दिखने और होने में फर्क जो समझने लगा हु ।
जो चीज़े आज ओझल नहीं होती बंद नज़रो से
खुली नजरो से कल उसे नजरंअदाज किया था मैंने ।
मेरी नजर को जो नजर लग गयी थी किसी की,
वक्त की ठोकरों ने उतार दिया उसे शायद ।
देखने लगा हु आरंभ और अंत के बीच का पथ
धुंध जो छट गयी है उतार और चढ़ावो से ।

तन्हाईया अपनी अपनी

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कोई इजहार न कर पाया, इंतजार किसी को मंजूर न था,
कल के वही काश तो रंगीन बनाते है आज की शाम को।
मत कोस इन तन्हाइयो को, मयखाने तो शुक्रगुजार है इसके,
दिलजलों के बिना भी कही महफ़िल सजा करती है।
अजीब है ये मयखाने, मिला देते है हर किसी को उस किसी से,
साकी में सुकून ढूंढने का हुनर जो मिलता है वहां।
पर मत मिलना साकी से कभी बिन पिए, बाहर मयखाने से,
वरना अपने दर्द, उसकी तन्हाइयो से बौने नज़र आएंगे ।

मोहब्बत और काल्पनिक हैवान

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कहते है मोहब्बत इंसान को अपने वजूद से मिलाती है,
‘मै भी कुछ हु’ इस बात का अहसास कराती है।
भला फिर क्यों इंसान को हैवानियत पसंद आती है?
शायद उसे अपने भीतर की कुंठा डराती है।
इसीलिए कुछ लोग हैवानियत की दुकान लगाते है,
काल्पनिक हैवानो से इंसानो का परिचय करवाते है।
मिलकर काल्पनिक हैवानो से इंसान खुद को बेहतर समझता है,
तब कही जाकर वो अपने आप से मोहब्बत कर सकता है।

मर्ज – ऐ – इश्क़

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किसी के मिलने से भला किसी के बिछड़ने का दर्द कम होता है?
मान तो लेता है दिल पर न जाने क्यों भूल नहीं पाता।
दर्द के बदले दर्द ये इलाज नहीं मर्ज – ऐ – इश्क़ का,
सच्चा इश्क़ रुलाता जरूर है पर कभी कम नहीं होता।

एक टीस सी उठती है जब भी खयाल आता है उस गुजरे हुए ज़माने का ,
सोचता हु क्या कोई फर्क पड़ता था मेरे होने और न होने का?
ए जिंदगी हर बार जब तू मिलाती है मुझे बीते हुए कल से,
तू शायद भूल जाती है अब मुझे फर्क नहीं पड़ता तेरे होने और न होने का।

गुजारिश

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या खुदा अब इंसानो पर थोड़ी कम मेहेर करना,
जिन्दा लाशो की धड़कने मत चालू रखना।
क्यों तू मरने वालो को वापस पैदा करता है,
इंसानो के दिल में क्यों जज्बात भरता है।
मोहब्बत नहीं इंसानो को नफ़रत ही सीखाना,
रहम दिल नहीं तू अब सबको संग-दिल बनाना।
मोहब्बत करने वालो को तू अक्सर रुलाता है,
नफ़रत भरे दिलो की तू ताजपोशी कराता है।

रास्ते और इंसान

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रास्ते कभी ख़त्म नहीं होते,
हां कुछ खो जाते है, कुछ याद रहते है ।
रास्ते तो बनते ही है बिगड़ने के लिए,
समय के थपेड़े जो झेलते रहते है।
इंसान भी भला कहा एक से रहते है,
टूटते रहते है फिर से जुड़ जाने के लिए ।
बदलाव निशानी है जिन्दा होने की,
ठहराव तो सिर्फ मिटटी के निचे होता है।

आग और हवा

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सोचना जरूर हवा देने से पहले आग को,
न करना शक कभी वफ़ा पर इसकी।
जो जलाने के लिए भेज देते है उसे कही,
आग वापस उन्ही के पास लौट आती है।
मुश्किल होता है पहचानना जब वो लौटती है,
ये आग अपनी है, या परायी किसी और की?
जरुरी नहीं कि वो मिले लौट कर खुद हमी से,
लिपटते देखा है उसे अक्सर अगली पुश्तों से।
हवा की फितरत होती है बिलकुल अलग,
वो ठहरती नहीं कभी किसी के पास।
न कर मोहब्बत हवा से, न कर आग से तू,
जफ़ा से जो बच गया, वफ़ा बेचिराख कर देगी तुझे।

इंसान रहित दुनिया

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इंसानो को जानवर तो वो हमेशा ही समझते थे,
पर शायद समझने और होने का अंतर परखते थे।
दुनिया भर में एक होड़ सी लगी है इस अंतर को मिटाने की,
इनमे और उनमे अपनों की बलि चढाने की।
नहीं करते वो आपस में बात कभी जिंदगी के अरमानो पर,
पर पूरी सहमति है इनमे और उनमे जित के पैमानों पर।
पैमाना ये है की कौन कितनो को किस हद तक गिरायेगा,
इंसान रहित दुनिया का सरताज वो ही कहलाएगा।