
एक होड़ लगी थी की कौन कितना खा सकता है,
असल में मायने ये रखता था की कौन कितना पचा सकता है।
सबकी देखा देखी मै भी हो गया इस होड़ में शामिल,
ये समझे बिना की मन की चाहत पर तन कैसे करे तामिल।
मन की भूख के दम पर मै खाये जा रहा था,
मुझे देखकर मेरे चेले चपाटे भी खा रहे थे।
भरोसा था सभी को अपनी अपनी भूख पर,
हम कोई पहली बार थोड़े ही खा रहे थे।
होड़ की शर्त ये थी की खाया हुआ पचना चाहिए,
अजीर्ण चाहे जितना भी हो पर नामोनिशान नहीं दिखना चाहिए।
पर धीरे धीरे सबका पेट फुलने लगा,
हर कोई एक दूसरे को शक की नज़र से घूरने लगा।
अजीर्ण के मारे सभी का जी मचलने लगा,
तभी एक पहलवान उलटी करने लगा।
उसी देख फिर हर कोई उगलने लगा,
जो छिपा रखा था वो बाहर निकलने लगा ।
सपने से जागा तो मै पसीने में सराबोर बैठा था,
राहत के अहसास के बीच एक प्रश्न मेरे सम्मुख खड़ा था।
ऐसी परिस्थिति आ जाये तो क्या करना है ?
खाने के बाद नहीं, सिर्फ खाने से पहले सोचना है ।