खाएं या न खाएं

Man resisting temptation to eat dessert

एक होड़ लगी थी की कौन कितना खा सकता है,
असल में मायने ये रखता था की कौन कितना पचा सकता है।
सबकी देखा देखी मै भी हो गया इस होड़ में शामिल,
ये समझे बिना की मन की चाहत पर तन कैसे करे तामिल।
मन की भूख के दम पर मै खाये जा रहा था,
मुझे देखकर मेरे चेले चपाटे भी खा रहे थे।
भरोसा था सभी को अपनी अपनी भूख पर,
हम कोई पहली बार थोड़े ही खा रहे थे। 
होड़ की शर्त ये थी की खाया हुआ पचना चाहिए,
अजीर्ण चाहे जितना भी हो पर नामोनिशान नहीं दिखना चाहिए।
पर धीरे धीरे सबका पेट फुलने लगा,
हर कोई एक दूसरे को शक की नज़र से घूरने लगा।
अजीर्ण के मारे सभी का जी मचलने लगा,
तभी एक पहलवान उलटी करने लगा।
उसी देख फिर हर कोई उगलने लगा,
जो छिपा रखा था वो बाहर निकलने लगा ।
सपने से जागा तो मै पसीने में सराबोर बैठा था,
राहत के अहसास के बीच एक प्रश्न मेरे सम्मुख खड़ा था।
ऐसी परिस्थिति आ जाये तो क्या करना है ?
खाने के बाद नहीं, सिर्फ खाने से पहले सोचना है ।

Published by Vasant V. Bang

I am a human being with all shades and imperfections. A management educator and advisor by profession I realized pretty late in life that my true calling is expression of human feelings, and hence this blog.

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