
जब आगे बढ़ने लगो,
तो पूछो अपने आप से।
ये नहीं की मंज़िल क्या है,
बल्कि ये की रुकना कहा है।
मंज़िले होती है छलावे की तरह,
दिखाई देती है पर हासिल नहीं होती।
वरना हम बस चढ़ते चले जाते है,
आसमान को छूने की जुस्तजू में।
जब लगता है बस एक उंगली भर बाकी है,
अक्सर उठ जाया करते है बवंडर।
और उडा ले जाते है वो सब भी,
जो पहली पायदान पर साथ था।
आज तक कोई नहीं लड़ पाया बवंडर से,
पर बचा जरुर जा सकता है।
रास्तो पर निकलने के बाद नहीं,
बस रास्ते चुनने से पहले।