मै खुदा नहीं

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किसी और से क्या लड़ना,
अभी खुद से जंग जो बाकी है।
किसी के आंसुओ का मोहताज नहीं मै
ये खज़ाना तो मेरे पास भी है।

पर इतना बड़ा भी दिल नहीं है मेरा
कि बाटता फिरू दर्द ज़माने से।
हा कोई अगर चाहे तो दे दो मुझे,
मेरे सर आँखों पर थोड़ी जगह खाली है।

किसी को रुलाना फितरत नहीं मेरी,
बस न रोको मुझे रोने से।
न मै लायक खुदा बनने के,
न ही ये जुस्तजू मेरी।

वारिस

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सरदार ने बनाया था भारत सभी को जोड़कर,
कैसे ले सकते है उनका नाम हम दिलो को तोड़कर?
आझाद हिन्द पर जो जान न्योछावर करते थे,
वो नेताजी क्या किसी और की गुलामी सह सकते थे?

बहरो को सुनाने के लिए जो बम के धमाके किया करते थे,
तारीख पर तारीख क्या वो शहीद ऐ आज़म सह सकते थे?
जाती और धर्म के नाम पर यदि हम दुराचारियो को बचाएंगे,
क्या हम छत्रपति शिवाजी महाराज के वारिस बन पाएंगे?

झूठा सुकून

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आज मेरे घर पर भीड़ चढ़ आयी,
ये ‘उनकी’ नहीं, अपनों की भीड़ थी।
मैंने ही तो गाए थे कभी इनके गुणगान,
ना कहता था मै ये ही बचाएंगे हमें ‘उनसे’?

फिर भला क्यों ये घुसना चाहते है मेरे घर में?
अब ये किसे अपनी जगह दिखाना चाहते है?
किसको खतरा देखते है मेरे बेटो से?
या इन्हे एतराज है मेरी बेटी की मोहब्बत पर?

जो कुछ भी हो, मै बचाऊंगा मेरे बच्चो को,
पर कैसे? मुझे गुजरे बरसो जो हो चुके है।
क्या इसी दिन को देखने के लिए मै मरा था?
क्या अपनेपन के अहसास का सुकून झूठा था?

आज के कत्लेंआम का खून मेरे हाथो पर भी होगा,
गैर जिम्मेदार बाप होने का अहसास भी होगा,
सजा ऐ मौत से बदतर होगी सजा मेरी,
आज मेरी रूह को जो फांसी दी जाएगी।

अपने पराये

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परायो को पहचानना तो आपने सीखा दिया,
अब अपना कौन है ये भी समझा देते।
मज़हब से तो वो अपने लगते है,
पर जात अलग होने की दुहाई देते है।
खुश हुए जब हम अपनी जात वालो से मिलकर,
तोड़ दिया दिल उन्होंने आमदनी पूछ कर।
हमारी त्वचा का रंग भी कुछ को नहीं भाया था,
त्वचा का ही नहीं हमारी कालर का रंग भी पराया था।
भाषाओ के परायेपन से बचने की कोशिश भी नाकाम रही,
कौन किस जगह से आया है भला भूलता है कोई?
हमारा घर था अपनेपन की खोज का अंतिम पड़ाव,
बेटा, बेटी और बहु के फर्क में यही तो मिला सबसे बड़ा घाव।
आप तो कह रहे थे थोड़ा सा बाटकर रुक जायेंगे,
इस काट छांट के बाद जो बचेंगे वो सब अपने हो जायेंगे।
पर अब ये हालात है की कोई भीनहीं लगता अपना,
बताइये ना ये सच्चाई है या बस एक सपना ।

उल्टी चाल

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ऐ मालिक बस एक मेहेर कर दे,
वक्त के पहिये को घुमा दे थोड़ा पीछे।
कुछ है ऐसा जिसे फिर जीना चाहता हु,
और कुछ ऐसा जिसे चाहता हु थोड़ा बदलना।

लौटा दे मुझे वो हर रात सुबह का इंतजार करने के लिए,
वो हर दिन जब होती थी आस किसी का दीदार करने की।
दोस्तो की महफ़िल फिर जमेगी उसी मुकाम पर,
पर मेरा ध्यान बातो में कम उनके घर की ओर ज्यादा होगा।

होते ही उनके दीदार सोचुंगा थोड़ा और ठहरु या चल दू तेजी से
ये फैसला निर्भर होगा उनकी चाल पर।
यदि वो रुक जाये थोड़ी देर अपनी सहेलियों के साथ
कहूंगा अपने दोस्तों से इतनी भी क्या जल्दी है?

पर यदि वो जो निकल पड़े तुरंत,
तो दोस्तों से कह दूंगा यार जरा जल्दी में हु।
हा फिर मेरे दोस्त मुझे हरामी कहेंगे,
पर फिर भी ऐ मालिक तू मेरे दोस्त मत बदलना।

हर बार जब वो मुड़ेंगी तो रोंगटे भी खड़े होंगे,
पर इस बार मै घबराऊँगा नहीं मुस्कुरा दूंगा।
मेरे मुस्कुराने से मेरे दोस्तों के सीने चौड़े हो जायेंगे,
वो मुझे देखेंगी, पर इस बात पर मेरे दोस्त इतरायेंगे ।

होते ही उनका दीदार उनकी खिड़की में,
लगेगा चाँद आसमान से तो नहीं उतर आया?
थोड़ी देर ठंडक देकर फिर जब चाँद ओझल हो जायेगा,
एक सुस्त चाल के साथ मै घर का रुख कर लूंगा ।

फिर एक दिन हौसला जुटाकर रोक लूंगा कही,
कर लूंगा दिल की बात वो मानेगी कैसे नहीं।
बस मालिक एक बार घुमा दे वक्त के पहिये को उल्टा,
कुछ है ऐसा जिसे फिर जीना चाहता हु।

नायक

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आप का जो जी चाहे बन जाइये,
पर मेहेरबानी करके हमें मत लड़ाइये।
आप और हम तो कल चले जायेंगे,
पर इस आग में हमारे बच्चे झुलस जायेंगे ।

आग लगाने वाले हमेशा खाक हो जाते है,
बुझाने वाले ही हमेशा याद रखे जाते है।
इतिहास गवाह है, इतिहास बदले नहीं बनाये जाते है,
मारने वाले नहीं, बचाने वाले ही नायक कहलाते है।

सपना

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सो जाऊँ कभी तुम्हारी ज़ुल्फो में तो मत उठाना,  

मेरे बालों को भले ही तुम मत सहलाना ।   

हा तुम अगर थक जाओ तो जरूर उठ जाना, 

पर मुझे मीठी नींद से मत जगाना।  

क्या करू बरसो से सोया जो नहीं, 

दुनिया के डर से कभी रोया भी नहीं।   

ढूंढता हू तुम्हे तो सब पागल कहते है, 

नासमझ कह कर वो मुझ पर हसते है।  

आज सपनो में ही सही मै तुम्हे पा तो लूंगा, 

जो कभी नहीं कह पाया वो बात कह दूंगा।  

तुम हा कह देना मेरा दिल रह जायेगा, 

पागल है साला यु ही खुश हो जायेगा।

ज़िंदा या मुर्दा?

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धर्म, जात, पंथ के नाम पर उन्होंने बाट दिया समाज को, 

कल बाट देंगे फिर वो इंसान के जिस्म और जान को।  

यदि लड़ जाएंगे अंग एक दूसरे से,

क्या हम जी पाएंगे सुकून से? 

यदि सर को ह्रदय से ऊपर मानेंगे, 

तो फिर हम दुसरो का दर्द कैसे जानेंगे? 

हाथ कमाते है तो कंधो से ज्यादा अहम् रखेंगे?

फिर तो किसी और का सहारा बनना ही हम छोड़ देंगे।  

पैर जो चलाते है हमे तो ज्यादा महत्व देंगे, 

पर रीढ़ को दुय्यम मानने पर हम कैसे खड़े रहेंगे? 

बोलने की बजाय सुनने का वो गुणगान करेंगे, 

जुबान की जगह कान की महत्ता का बखान करेंगे।  

वो तो हमारी दोनों आँखों को एक दूसरे से लड़ा देंगे, 

देखने की जरुरत ही क्या है ये समझा देंगे।  

यदि हमारे आंख, नाक, कान ही आपस में भीड़ जायेंगे, 

हम ज़िंदा भी है या मुर्दा, ये भी न समझ पाएंगे।  

दिल

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दिल भी अजीब है, जरा ज्यादा ही दुखता है, 

प्यार को क्यों अपनी अमानत समझने लगता है।  

किसी ने कभी कर लिया हो प्यार का इजहार,

कैसे हो गया उस पर जिंदगी भर का उधार?  

इतनी सी बात भला ये क्यों नहीं समझ पाता, 

प्यार भी करता है और कसक भी है जताता। 

ऐ पागल दिल यदि तु टुटकर जुड़ नहीं पाता, 

तब फिर तु शीशा नहीं, पत्थर कहलाता।