हर कोई नशे में चूर है यहाँ किसी को खुद जमीं से जन्नत देखनी है तो किसी को बेदखल करना है औरो को जमीं से एक सूंघ कर करता है नशा, दूसरे का नशा झलकता है रफ़्तार में। दर्शक भी चूर है यहाँ एक अजीब से नशे में ‘गैरो’ से नफरत बिना वे खुद से मुहब्बत नहीं कर पाते इसीलिए तो उन्हें ‘खान’ और ‘मिश्रा’ अलग नज़र आते।
ऐ कसक, कायल हु मै तेरी वफ़ा का, एक तू ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी। कद से नापकर उचाई जिन्हे कल बौना बुलाते थे, पैमानों के बदलते ही वो आज ऊंचे नज़र आते है।
कल जिन्हे टाल देते थे बच्चा कहकर, आज जब है चर्चा उन्ही की उम्र के ठहराव की। साइकिल से लेकर हवाई जहाज तक, एक कसक ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।
कल जो मिजाज बेरंग कहलाते थे, आज उसे सादगी कह कर दाद देते है। बदल जाते है दौर राजा के भी और रंक के भी, एक कसक ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।
सिफारिश जिनसे किया करते थे कभी, आज वो खुद सिफारिश लिए आते है। न उनका कल आज रहा, न होगा मेरा आज कल, एक कसक ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।
ढूंढता है हर कोई ऐसा जो उसका बोझ हल्का कर दे थक गए है सब अब अपनी लाश उठाये हुए। उठते जरूर है कुछ कंधे सहारा देने दुसरो को, पर उनकी सिसकियों से धड़कने लौट आती है।
फिर होती है अजीब सी घबराहट धड़कनो के लौटने से, भूल चुके होते है जिन जख्मो को, क्या वे फिर दर्द देगी? पहले तो दर्द के अहसास पर अकेले रो लिया करते थे, अब दुसरो को रुलाने का पाप होगा हर किसी के सर।
अक्सर जो दामन थमाता है तु पोछने किसी की आँखे, या खुदा क्यों वो खुद आंसुओ में सरोबार होता है । न तू बेदर्द जीने देता है और न ही सुकून से मरने, क्या हमारी खता ही ज्यादा है या कमी है तेरी रहमत में?
कौन कहता है कल एक होता है, बिते भी कई होते है, और आने वाले भी कई। कुछ कल होते है जो बस ठहर जाते है, मानो सूरज ने उगना बंद कर दिया हो जैसे।
हलाकि हर रात के बाद सुबह होती है, पर कुछ कटती है सालो में कुछ चलती है सदियों तक। नहीं होना चाहिए ताल्लुक इस दरमियान के कल से, जब रास्ते अंधेरो में तय किये थे।
पर रौशनी के लौटते ही उठ खड़े होते है सवाल, याद आते है वो मोड़ जहा ठोकरे खायी थी। दास्ता रास्ते के उतराव और चढाव की, एक सिहरन पैदा कर देती है सीने में ।
बिता कल फिर आने वाले कल से डराता है, अँधेरे की आशंका से ही दिल कांप जाता है। ए मालिक क्यों तूने आज के दोनों ओर कल बनाये, दोनों कल के बीच भला आज कैसे जिया जाये?
शीशे के घरो में रहकर वो ही पत्थर फेंकते है, जो नकाब पहनकर आईने देखते है। पत्थरो के रुख तो फ़िज़ा के साथ बदल जाते है, फेकने वालो की ही वो अक्सर नकाब गिराते हैं।
चमक दमक और खूबसूरती में वही अंतर होता है, जो ईमारत की लीपा पोती और नीव में होता है। रंगो की परते दरारों को छुपाती है, बुझाती नहीं, और वो भी उनसे कहाँ जिनकी नज़रे होती है सही? पर अगर नजर से जो हर कोई जोहरी बन जाता, तब क्या फिर कोई पत्थर कभी हिरे की जगह ले पाता? खुशबू जिस्म की है या इत्र की कहाँ हर कोई जानता है, यहाँ हर कोई सिर्फ फ़िज़ा के रुख को पहचानता है। फ़िज़ा के साथ बह जाने में जो समझदारी मानते है, कहते है ज़माने के उसूलो को सिर्फ वही पहचानते है। पर होते है कुछ जो फ़िज़ा का रुख मोड़ देते है, देर से ही सही पर वो आखिर ज़माने को पीछे छोड़ देते है।