नेताजी का चिंतन

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स्वतंत्रता दिवस की सुबह जिन नेताजी ने झंडा फहराया,

फिर महापुरुषों याद में भावनाओ भरा भाषण सुनाया। 

वे ही नेताजी शाम को पार्टी में बतिया रहे थे,

हस हस कर चेलो को महापुरुषों की बेवकूफी समझा रहे थे। 

बोले बेकार ही भगत सिंह फांसी पर चढ़े थे,

कल मांगेगे खालिस्तान उन्हें न पता था।

वरना अगर लोगो को आपस में जो लड़ाते ,

एक नए देश के राष्ट्रपति जरूर बन जाते। 

वो लाला लाजपत भी खुद लाठिया खाते थे,

शुरू कर आंदोलन गिरफ्तार क्यों नहीं हो जाते थे। 

अरे गोलिया खाने को यहाँ जनता ही क्या कम है,

जो खुद खाए गोली, उस नेता में क्या दम है। 

मौलाना आजाद ने कहते है बड़ा भाईचारा बढ़ाया,

पर आजाद हिन्द में क्या तो सिर्फ शिक्षामंत्री का पद पाया।

इससे अच्छा तो धरम रक्षक बन जाते,

पड़ोस में जाते तो शायद प्रधानमत्री बन जाते। 

और वो गाँधी भी क्या जो पैरो पर चलते थे,

शायद उस ज़माने में एयर कन्डिशन रथ नहीं मिलते थे। 

अरे मै पूछता हु, जब प्रधानमंत्री नहीं था बनना ,

फिर भला छोड़ वकालत अंग्रेजो से क्यों लड़ना?

जब आज़ादी के लिए इतने नेताओ ने बलिदान दिया,

तब इन सबने भला अकेले पंडितजी को कैसे प्रधानमंत्री बनने दिया। 

हम होते तो धमकाते, की हम भी प्रधानमंत्री बनेंगे,

वरना अंग्रेजो को आज़ादी वापस कर देंगे।

रुह

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उनके न मिलने का रंज करू,

या मनाउ जशन उन सुनहरी यादो का?

इजहार ऐ मुहब्बत हमने न की थी,

तो गुनहगार उन्हें ठहराऊ कैसे?

मुझे अपने होने का पहला अहसास जिसने कराया,

ज़माने की भीड़ में जिसने मुझे अपने आप से मिलाया ।

उससे शिकवा करू इतना मै खुदगर्ज़ नहीं,

उनकी जगह सजदे में है, मै भूल जाऊ कैसे?

बाहो में भर लेना मंजिल नहीं मुहब्बत की,

वो तो अहसास है जो रूह के हर कतरे में उतर जाता है।

किसी ने गर वो अहसास कराया,

तो उसका यह क़र्ज़ चुकाऊ कैसे?    

फासले तो होते है केवल जिस्मो में ,

रूह तो हमेशा साथ होती है। 

फिर क्या मिलना और क्या बिछड़ना,

पर ये अपने दिल को समझाऊ कैसे?

वो गलिया

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बचपन की वो गलिया आज भी वही है,

बस हम लोग दूर और कही है।

हा कुछ रास्ते जरूर हो गए है चौड़े,

अब वो मैदान भी नहीं जहा थे हम कभी दौड़े।

कुछ इमारते ज़रूर ढह गयी है,

चार आने की गोली वाली दुकान भी अब नहीं है।

वो चौराहा भी कुछ बदला बदला सा लगता है,

पर आज भी वहा जाते ही समां सा बंधता है।

हा नक़्शा जरूर बदला है मेरी शहर की गलियों का,

पर हर गली से जुडा है नाम मेरे दोस्त और सहलियों का।

जाना चाहिए उन गलियों में कभी कभार अपने आप से मिलने,

बड़ा सुकून मिलता है फिर से नासमझ बनने में।

बक्श दो यमराज

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खुले नहीं है मंदिर, न ही मस्जिदे खुली है,

बंद है गिरिजे, गुरद्वारे भी बंद है ।

आज जब सबसे ज्यादा जरुरत है हमें ,

तो क्यों इन सबके हात तंग है।

इनके नाम पर मरने मारने पर उतारू रहने वाला इंसान,

कैसे आज मान बैठा डॉक्टर को ही अल्ला, गॉड और भगवान।

बक्श दो यमराज आज अगर मै तुम्हारे साथ जो आ जाऊंगा,

एक छोटे से विषाणु से मर गया यह इल्जाम नहीं सह पाउँगा।

वादा है मेरा यमराज, बहोत जल्द होऊंगा हाजिर आपके दरबार में,

आप शायद वाकिफ नहीं परमाणु बम का भंडार है संसार में।

इससे भी बच गया तो दंगे फसाद में ‘शहीद’ हो जाऊंगा,

पर बिना किसी को मारे ही मर गया ऐसा बुजदिल तो नहीं कहलाऊंगा।

कुछ सवाल अपने आप से

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आज हमारे घर में कोई भुखमरी का शिकार नहीं है, 

क्योंकि खेत खलिहानो में कोई पसीना बहाता है। 

आज हम नंगे हो तो भी वैसे दिखाई नहीं पड़ते, 

क्योंकि कोई हमारे लिए कपडे बुनता है।  

क्या अहसास है हमें की हम जीन घरो में ऐशो आराम से रहते है, 

उनके लिए सीमेंट की बोरियों उठाई है कईयो ने अपने कंधो पर।  

देश विदेश की सैर सपाटे कर हम फिर जमींन पर उतर पाते है, 

उन्ही के द्वारा बनाये गए हवाई अड्डों पर।  

दिवाली, ईद, क्रिसमस और बैसाखी पर हम घर जा पाते है,

क्योकी रेल की पटरिया बिछा रखी है किसीने।   

आज जिसके सीने पर हम गाड़िया दौड़ाते है शानो शौकत से, 

वोह सड़के बनी है किसी के खून पसीने से।  

हममे से कुछ लोग सेठ और उद्योगपति कहलाते है,

क्योंकि मशीनो पर घिसते है कई कारखानों में। 

शादी समारोहों में हम हिरे जवाहररात चमकाते है, 

क्योंकि जान जोखिम में डाल कर उतरते है कुछ खदानों में।  

मई की चिलचिलाती धुप में जब वोह निकल पड़े है पैदल, 

क्या हमें उनमे अपने बच्चे और बूढ़े माँ बाप नहीं दिखाई दिए?

चार छे महीने की तन्खा भी न दे पाए, 

क्या इतने भुक्कड़ हम हो लिए? 

देश निर्माण करने वालो से इस बदसलूखी को क्या कहे?

जो उनका किया नहीं, उसकी सजा वो क्यों सहे ?

क्या उनको इन हालातो में छोड़ देना देशद्रोह नहीं है?

यदि इन हालातो में कोई हमें पाखंडी कहे तो बिलकुल सही है।

सालगिरह

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वो हमारी सालगिरह पर मुबारकबाद देने नहीं आयी,

किसी और की महफ़िल जो आबाद हो रही थी। 

पर यह हमारा दावा है की गर जनाजा जो हमारा निकला,

तो वो पहले हमारी कब्र पर आएगी। 

हमें दफनाए सिवा वो कही और नहीं जाएगी। 

यु तो हर सालगिरह पर हमारी जिंदगी से एक साल चला जाता है,

पर गम कैसा उनसे मिलने का लम्हा तो पास आता है।

यही सोचकर हम साल दर साल अपनी सालगिरह मनाते है,

अब तो हर पल बस खुदा से यही मिन्नत माँगते है,

या खुदा मौत हमें ऐसे वक्त न देना की उनकी महफ़िल में गैरत पड़े,

जीते जी तो उन्हें हमसे गिला रहा, हमारी मौत पर तो उन्हें सुकून मिले।

पहला प्यार

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झूठे है जो कहते है प्यार सिर्फ एक बार होता है,

प्यार तो प्यार है कई कई बार होता है। 

पर यह भी सच है की वो खास होता है,

जब किसी को प्यार पहली बार होता है। 

नासमझ ना भी हो तो पूरी समझ भी होती नहीं,

पर उसे कौन अच्छा लगता है यह समझता है हर कोई। 

अच्छा लगने लगे कोई इसका कारण ज़रूरी नहीं,

बस लगने लगती है उसकी हर चीज सही। 

पहली बार दिल की धड़कनें बिगड़ने का अहसास होता है,

उसके आँखों से ओझल होते ही दर्द का आभास होता है।

पागल ना हो जाऊ इस बात से डरने के बजाय दिल झूमने लगता है,

पहली बार किसी अनजानी तस्वीर को चुमने लगता है।

किसी अनजाने के चाहने में एक खुमारी होती है,

उसे पाने की चाहत में कुछ भी कर गुजरने की तैयारी होती है। 

शायद यह पहला अहसास होता है बगैर शर्तो के प्यार का,

कुछ खास ही होता है इंतजार इकरार का।

मिल जाए जो ‘उससे’ नज़र तो बस समां बंध जाता है,

गर हो जाए एतबार तो फिर कोई और नज़र ही नहीं आता है।  

वासना का जब दूर दूर तक भी न हो खयाल,

फिर भी मिलने को दिल तड़पे यह होता है पहला प्यार।

दौर

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जहा आकर रुक गए थे कुछ के दौर,

उसी वक्त शुरूवात कर रहे थे कुछ और।

जीतनी उम्र थी उनकी, जब उनके दौर ख़त्म हुए,

उससे ज्यादा उम्र के तो आज हमारे दौर हो गए।

आज जब हम उपरी पायदान पर चढ़ गए,

तब भी कहा हमारे दौर बंद हुए।  

यह कहना हमारा घमंड नहीं, है यह हमारा मरहम,

लाख दबाये दर्द दिख ही जाता है गहरी जो है जख्म।

किसी का दिल दुखाना यह नहीं हमारा मकसद,

पायदानो की उचाईयो से हमें न तोले बस यही रही हसरत।

आज यह हम किसी और से नहीं अपने आप से बोलते है,

हमारा वजन हम किसी और के नहीं अपने तराजू से तौलते है।

मास्क

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मास्क पहनने के लिए वायरस को क्यों बदनाम करते हो,

बिना मास्क हम जी ही नहीं सकते, कहने से क्यों डरते हो। 

भीतर के बच्चे को छुपाने के लिए ‘बडे’ हो जाने का मास्क आता है,

कोई ज़िन्दगी भर नादान बना रहे ज़माने को कहा सुहाता है। 

पहले बेटा, फिर पति, फिर बाप वाला मास्क पहन लिया,

अब तो हालत यह है की आईने ने भी हमें पहचानने से इंकार कर दिया। 

सिर्फ एक मैखाना ही है जहा हम बगैर मास्क नज़र आते है,

इस लिए तो जाम और साकी का क़र्ज़ कभी नहीं चूका पाते है। 

मेरा कसूर !

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क्या हम जानते है जो हम आज करेंगे,

उसकी कीमत हमारे ही पोते पोती कल भरेंगे।

अगर करेंगे हम समर्थन दंगाइयों का लेकर ‘धर्म’ का नाम,

कल वे ही बुलाएँगे हमारे पोते को कहकर है अपने ‘पंथ’ का काम।

जब धर्म और पंथ के मुद्दे कमजोर पड जायेंगे,

तब कोई नेताजी ‘जाती’ का झंडा लहरायेंगे।

दूसरे नेताजी फिर ‘भाषा’ का मुद्दा उठाएंगे,

अस्मिताओं की होली में औरो की बलि चढ़ाएंगे। 

इस अस्मिता युद्ध में अगर मेरा पोता मारा जाएगा,

किसी नेता की नज़र में वो शहीद कहलाएगा। 

जब मेरा बेटा उसके बेटे की मौत पर बैठा होगा आँसू बहाते,

नेताजी अपने बेटे के साथ दूर विदेश में दिखाई देंगे पार्टी मनाते।

पर मेरी बहु नेताजी से ज्यादा कसूरवार मुझे ठहराएगी,

अपने खुद के पोते की हत्या का इल्जाम मुझ पर लगाएगी। 

पूछेगी, जब मच रहा था बवाल  आप कैसे सो रहे थे,

कही ऐसा तो नहीं दूसरे के जलते घरो पर आप खुश हो रहे थे । 

आज जब आपके पोते की लाश यहा पड़ी है,

आपकी बहु सामने प्रश्न लिए खड़ी है। 

आपकी झूठी मर्दानगी ने मुझसे मेरा बीटा छीन लिया,

हमारे ‘आज’ का फैसला करने का हक आपको किसने दिया।