
ऐ मालिक क्यों तू किसी के भीतर प्यार जगाता है,
मुकाम से पहले फिर क्यों तू उन्हें जुदा करवाता है?
कहते है जुदाई का दर्द नासूर बन जाता है,
तो फिर क्यों मर्ज को कातिल में ही हकिम नजर आता है?
सिर्फ दिमाग से ही था अगर जिंदगी चलाना,
फिर ऐ मालिक नहीं चाहिए था तूने दिल बनाना।
है जो अगर दिल तो जरूर धड़केगा,
चाहेगा किसी को और किसी के लिए तड़पेगा।
जिस्म में दिल डालने से पहले सोचा क्यों नहीं,
अब समझाने लगे इंसानो को क्या गलत, क्या सही।
दिल के धड़कने भर को कैसे मानले जिंदगी,
जिन्दा इंसानो की क्या तूने देखी नहीं बंदगी।
किसी के चाहने से गर कोई खुद को चाहने लगे तो क्या यह गुनाह है,
गर है यह गुनाह तो हा यह गुनाह यहाँ हर किसी ने किया है।
पर इंसानो से बढ़कर गुनाह तो फिर मालिक तूने किया है,
इंसानो के वज़ूद में तूने दिल जो दिया है।