ये ऐसा है वो वैसी है

ये ऐसा है वो वैसी है, आसानी से राय बना लेते है लोग, 

खुद से अनजाने मगर गैरो की तस्वीर बना लेते है लोग।  

जिन्हे कभी फुर्सत नहीं मिलती भीतर झाकने की, 

अक्सर वो ही जुर्रत करते है बाहर ताकने की।  

“आँखों देखि कानो सुनी” ने कइयों को गुमराह किया है,

इंसानो की छोड़ो इसने भगवान को तक दर्द दिया है।  

कान वही सुन पाते है जिनमे आवाज़ होती है, 

उन सिसकियों का क्या जो बेजुबान होती है ?

आँखों को देखने के लिए रोशनी जरुरी होती है,

पर सच्चाईया अक्सर अँधेरे की चादर ओढ़े सोती है।  

इस जहाँ में लोग जानने को ही समझना मान लेते है,

हाँ ये वो लोग होते है जो सिने को ही दिल मान लेते है।

पत्थर और नकाब

शीशे के घरो में रहकर वो ही पत्थर फेंकते है,
जो नकाब पहनकर आईने देखते है।
पत्थरो के रुख तो फ़िज़ा के साथ बदल जाते है,
फेकने वालो की ही वो अक्सर नकाब गिराते हैं।

प्यार और पसंद

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प्यार ही पसंद हो जरुरी तो नहीं,
पसंद जो ख्वाहिशो की गुलाम होती है।
प्यार तो ताउम्र वही रहता है,
ख्वाहिशे अक्सर बदल जाती है।

जो होता प्यार अकेली ख्वाहिश,
तब वो कैसे पहला या दूसरा होता।
वीरान हो जाते मयखाने
और गझल का नामो निशान न होता।

ख्वाहिशे खुद ही की हो,
ये भी कहा मंजूर ज़माने को।
इंसान को सामान बना देते है,
यहाँ ज़माने को दिखाने को।

अंतर

चमक दमक और खूबसूरती में वही अंतर होता है,
जो ईमारत की लीपा पोती और नीव में होता है।
रंगो की परते दरारों को छुपाती है, बुझाती नहीं,
और वो भी उनसे कहाँ जिनकी नज़रे होती है सही?
पर अगर नजर से जो हर कोई जोहरी बन जाता,
तब क्या फिर कोई पत्थर कभी हिरे की जगह ले पाता?
खुशबू जिस्म की है या इत्र की कहाँ हर कोई जानता है,
यहाँ हर कोई सिर्फ फ़िज़ा के रुख को पहचानता है।
फ़िज़ा के साथ बह जाने में जो समझदारी मानते है,
कहते है ज़माने के उसूलो को सिर्फ वही पहचानते है।
पर होते है कुछ जो फ़िज़ा का रुख मोड़ देते है,
देर से ही सही पर वो आखिर ज़माने को पीछे छोड़ देते है।

किसका गुनाह?

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ऐ मालिक क्यों तू किसी के भीतर प्यार जगाता है,

मुकाम से पहले फिर क्यों तू उन्हें जुदा करवाता है?  

कहते है जुदाई का दर्द नासूर बन जाता है,

तो फिर क्यों मर्ज को कातिल में ही हकिम नजर आता है?

सिर्फ दिमाग से ही था अगर जिंदगी चलाना,

फिर ऐ मालिक नहीं चाहिए था तूने दिल बनाना।  

है जो अगर दिल तो जरूर धड़केगा, 

चाहेगा किसी को और किसी के लिए तड़पेगा।  

जिस्म में दिल डालने से पहले सोचा क्यों नहीं,

अब समझाने लगे इंसानो को क्या गलत, क्या सही। 

दिल के धड़कने भर को कैसे मानले जिंदगी,

जिन्दा इंसानो की क्या तूने देखी नहीं बंदगी।  

किसी के चाहने से गर कोई खुद को चाहने लगे तो क्या यह गुनाह है,

गर है यह गुनाह तो हा यह गुनाह यहाँ हर किसी ने किया है। 

पर इंसानो से बढ़कर गुनाह तो फिर मालिक तूने किया है, 

इंसानो के वज़ूद में तूने दिल जो दिया है।

लाश की चिंता

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एक लाश लगी थी क़तार में,
इंतजार था अपनी बारी का।
गहरी चिंता में डूबी थी,
ऊपर से अकेलापन खाये जा रहा था।

कुछ रिश्तेदार जरूर थे साथ,
सफ़ेद चादर ओढ़े उसी क़तार में।
जो जिन्दा थे वो भी लगे थे क़तार में,
कुछ अस्पताल के तो कुछ ऑक्सीजन के इंतजार में।

लाश को चिंता जलाये जा रही थी,
चिता नसीब होगी या कोई नदी नाला।
डर नहीं था उसे चील कव्वो के खाने का,
खयाल था तो बस ‘अपनों’ की प्रतिमा बचाने का।

नया रोग

आदमी के लाश बन जाने पर रोष नहीं,
लाशो की खबर बन जाने पर एतराज है।
ये कैसा दौर है जनाब, ये कैसे लोग है?
शायद क़त्ल की तरफदारी एक नया रोग है।

कोरोना का क्या कल वो चला जायेगा,
जलती चिताओ का दौर भी थम जायेगा।
पर इस नए रोग से हमारा जमीर मर जायेगा,
बिना इंसानियत का इंसान कैसे जिन्दा रह पायेगा?

संस्कारो को मत भूल जाना (व्यंग्य )

यदि मै जब कभी संक्रमित हो जाऊंगा,
शायद अपने को डॉ अली के अस्पताल में पाउँगा।
मेरी ऑक्सीजन का स्तर जो गिर जायेगा,
बेटा दौड़कर सिस्टर मारिया को बुलाएगा।

यदि मेरे साथ मेरी पत्नी भी संक्रमित हो जाएगी,
मेरे परिवार को तब गुरुद्वारे के लंगर की याद आएगी।
भगवान न करे पर जब मेरी सांसे उखड जायेगी,
मेरे बेटे को अपने पराये की पहचान हो जाएगी।

बेटा मुझे कंधा देने वालो के धर्म से मत वास्ता रखना,
मेरी चिता रचने वालो को तू जाती से मत परखना।
हा बस मेरे श्राद्ध के वक्त तू संस्कारो को मत भूल जाना,
अली, मारिया और सरदार अंकल को मत बुलाना

गुमान न कर कोरोना

कुछ लाख इंसान क्या मार दिए
ये कोरोना अपने आप को सर्व शक्तिमान समझने लगा।
इंसानो की मौत पर रोने वाले बुज़दिल नहीं हम,
दम है तो हमारी वहशियत को ख़त्म करके बता।

है हिम्मत तो बता छीनकर हमसे हमारी साम्प्रदायिकता,
अरे कोरोना तू नहीं बदल सकता हमारी मानसिकता।
शमशान और कब्रिस्तान पर तो हम अपने महल बनाते है,
हम वो है जो चिताओ के बिच बैठ कर उत्सव मनाते है।

तुझे क्या लगता है तेरे डर से हम अस्पताल बनाएंगे,
बाबाओ को छोड़ हम क्या विज्ञानं को अपनाएंगे?
इतना गुमान न कर कोरोना बस ये दौर गुजर जाने दे,
बहोत जल्द ही हम अपनी असलियत फिर तुझे बताएंगे ।

मेरे पुरखो का देश

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भक्तिरस से तृप्त होकर जैसे ही मै सो गया,
खुशहाल चमन के सपनो का दौर शुरू हो गया।
जब किसी विघ्नसंतोषी ने मुझे जगाया,
मैंने अपने आप को किसी और स्थान में पाया।

यहाँ मित्रो में होड़ लगी थी, कौन क्या बेचेगा,
बेचने वाले निश्चिन्त थे मै भला क्या सोचूंगा।
इसीलिए वे काफी कुछ मुफ्त में बाट रहे थे,
मेरी सहमति से ही वो मेरी जेब काट रहे थे।

रोजी रोटी के लिए नहीं था कोई आंदोलन,
भाषा, जाती, धर्म का था ज़बरदस्त सम्मोहन।
समूहों के झुंड में मै मेरा देश ढूंढ रहा था,
क्या यही है वो जिसे मेरे पुरखो ने देश कहा था ?