राजा का दिल

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सोचकर ये कि कल महफूस रहे उसकी पुश्ते,
आज दांव पर लगा दी उसने किसी और की।
बस भी करो, जंग का इल्जाम न दो राजा को,
मरने वालो को शहीद भी तो वो कहता है।
छुपाने के लिए दर्द हर एक बेवा का,
समाज से फक्र का चोला भी तो वो दिलवाता है।
जिनके सर से छीन गया हो बाप का साया,
उनके फुले हुए सिनो की दाद भी तो वो देता है।
इस फक्र को पाने की वो कभी इच्छा नहीं जताता,
खुदके बच्चो को वो सिपाही तक नहीं बनाता।
बहोत बड़ा दिल होता है राजा का,
हमेशा बाट देता है शहादत का मौका औरो को।

गरीब अमिर 

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हर शख्स सोचता है कि क्या था वो किसी की किताब में कही?
हालांकि खुद उसकी किताब में कुछ नाम रहे होंगे जरूर।
जिंदगी खड़े कर देती है ये सवाल उस वक्त,
जब उसकी किताब के बचे होते है सिर्फ चंद पन्ने।
ऐसा नहीं की हर किसी की किताब खाली ही रही हो,
न होती है कमी पन्नो की हर किसी की किताब में।
कही लिखी होती है शोहरत तो कही दौलत भी,
कई वो चीजे जो भाती है दुनिया की नजर को।
बढ़ भी चुकी होती है उसकी कीमत उस हर किताब से,
जो कभी इतराती थी पन्नो की चमक पर।
दुनिया की नज़र में शायद वो अमिर भी कहलाए,
पर खुदकी नज़र से अपनी गरीबी कोई छुपाए कैसे?

एलान- ऐ -जंग

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बरसो बाद ये खबर आयी कि वो पीछे छूट गया,  

तब कही अहसास हुआ उससे जुदा होने का।  

एक कारवां जो साथ चलता था हर वक्त,

शायद उसकी सिसकियों को दबा देता था ।  

अव्वल होता था वो खुद से दौड़ने की रेस में, 

पर जिंदगी ने एक दिन रेस ही बदल दी ।

ला खड़ा किया उसे एक ऐसी रेस में 

जहा दौड़ना था दुसरो के कंधो पर बैठ कर।  

हरा कर उस रेस में जो उसकी ख्वाहिश ही न थी,

जिंदगी ने उसे मानो जितना ही भुला दिया जैसे। 

टुटा जरूर था वो पर भागा नहीं रण छोड़कर,

गिरने के लिए उठ जाना जो सिख लिया था उसने।  

अब जब मै वाकिफ हो गया उसकी जुदाई से,

एलान- ऐ -जंग तू नहीं मै करता हु ए जिंदगी। 

वसूल करूँगा उसके हर खोये पल की कीमत,

दर्द जो महसूस करता हु मै उसका। 

जिसे तूने मुझसे छीना था ए जिंदगी

वो कोई और नहीं मै खुद था।  

ए जिंदगी बस अब एक वादा कर मुझसे 

तू रण छोड़ नहीं भागेगी मुझे मेरे साथ देखकर।   

रहमदिल जख्म

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कुछ जख्म कभी भरते नहीं,
बस छुप जाते है वक्त की चादर तले।
उभरने के लिए यादो की आँधियो में,
जो थमती नहीं सांस रुके बिना।

कभी याद आ जाती है चिलचिलाती धुप
बरगद की छाँव में जहा कदम ठहर जाते थे।
कभी गरजते बादल और घनघोर बारिश,
जो रोक देती थी घर के बाहर निकलने से।

अजीब था वो जाडो का मौसम
जिसने सर्द कर दिया था रास्तो को।
बर्फ पर फिसलने से हुए जख्म
छुप गए थे फिर से उभरने के लिए ।

दर्द महसूस वो कराते है सिर्फ इसलिए,
की जिन्दा होने का अहसास बना रहे।
नासूर हो भले ही पर मरने नहीं देते
बड़े रहमदिल होते है ये जख्म।

तेरे खत – एक अलग अंदाज

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तेरी खशबू में बसे खत मै जला भी देता,
पर दिल में लगी आग बुझाता कैसे ?
गंगा में भला क्यों तेरे खत मै बहाता
मेरे अश्को का दरिया क्या कम था ?

जज्बात है ये खत, कोई सामान नहीं,
अश्को की बारिश से ताज़ा रखा है उन्हें।
और हा, हर अश्क लहू से सिचा है मैंने,
मैले न हो जाये तेरे खत यही सोचकर।

नशा हवा का

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अजीब नशा होता है हवा का,
शराब तो फिर भी सुबह उतर जाती है।
मिटा देते है दोनों ही फर्क होने और न होने में,
पर हवा तो बिन पिए ही चढ़ जाती है।
आसान होती है सवारी हवा की,
मुश्किल तो होता है गाड़े रखना पैरों को।
कौन मुकम्मल हुआ है हवा के सैलाब मे,
आना तो हर किसी को जमीं पर ही है।

नशा

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हर कोई नशे में चूर है यहाँ
किसी को खुद जमीं से जन्नत देखनी है
तो किसी को बेदखल करना है औरो को जमीं से
एक सूंघ कर करता है नशा,
दूसरे का नशा झलकता है रफ़्तार में।
दर्शक भी चूर है यहाँ एक अजीब से नशे में
‘गैरो’ से नफरत बिना वे खुद से मुहब्बत नहीं कर पाते
इसीलिए तो उन्हें ‘खान’ और ‘मिश्रा’ अलग नज़र आते।

कसक

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ऐ कसक, कायल हु मै तेरी वफ़ा का,
एक तू ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।
कद से नापकर उचाई जिन्हे कल बौना बुलाते थे,
पैमानों के बदलते ही वो आज ऊंचे नज़र आते है।

कल जिन्हे टाल देते थे बच्चा कहकर,
आज जब है चर्चा उन्ही की उम्र के ठहराव की।
साइकिल से लेकर हवाई जहाज तक,
एक कसक ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।

कल जो मिजाज बेरंग कहलाते थे,
आज उसे सादगी कह कर दाद देते है।
बदल जाते है दौर राजा के भी और रंक के भी,
एक कसक ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।

सिफारिश जिनसे किया करते थे कभी,
आज वो खुद सिफारिश लिए आते है।
न उनका कल आज रहा, न होगा मेरा आज कल,
एक कसक ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।

एक सवाल खुदा से

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ढूंढता है हर कोई ऐसा जो उसका बोझ हल्का कर दे
थक गए है सब अब अपनी लाश उठाये हुए।
उठते जरूर है कुछ कंधे सहारा देने दुसरो को,
पर उनकी सिसकियों से धड़कने लौट आती है।

फिर होती है अजीब सी घबराहट धड़कनो के लौटने से,
भूल चुके होते है जिन जख्मो को, क्या वे फिर दर्द देगी?
पहले तो दर्द के अहसास पर अकेले रो लिया करते थे,
अब दुसरो को रुलाने का पाप होगा हर किसी के सर।

अक्सर जो दामन थमाता है तु पोछने किसी की आँखे,
या खुदा क्यों वो खुद आंसुओ में सरोबार होता है ।
न तू बेदर्द जीने देता है और न ही सुकून से मरने,
क्या हमारी खता ही ज्यादा है या कमी है तेरी रहमत में?

कैसे जिया जाये?

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कौन कहता है कल एक होता है,
बिते भी कई होते है, और आने वाले भी कई।
कुछ कल होते है जो बस ठहर जाते है,
मानो सूरज ने उगना बंद कर दिया हो जैसे।

हलाकि हर रात के बाद सुबह होती है,
पर कुछ कटती है सालो में कुछ चलती है सदियों तक।
नहीं होना चाहिए ताल्लुक इस दरमियान के कल से,
जब रास्ते अंधेरो में तय किये थे।

पर रौशनी के लौटते ही उठ खड़े होते है सवाल,
याद आते है वो मोड़ जहा ठोकरे खायी थी।
दास्ता रास्ते के उतराव और चढाव की,
एक सिहरन पैदा कर देती है सीने में ।

बिता कल फिर आने वाले कल से डराता है,
अँधेरे की आशंका से ही दिल कांप जाता है।
ए मालिक क्यों तूने आज के दोनों ओर कल बनाये,
दोनों कल के बीच भला आज कैसे जिया जाये?