उससे मुझे मुहब्बत हो जाये इसलिए,उसने मुझे अपने आप से नफरत करना सिखलाया।अरे कितना छोटा है तू बोला वो मुझसे,आ मेरे पास, तेरा कद मै खिंच दूंगा। खुश होकर मै जैसे ही उसके पास पहुंचा,उसने धर दिए अपने पैर मेरे सर पर।उंचाई पर पहुंचते ही फिर शुरू की उसने नयी खोज,उनकी जो तैयार हो खुदContinue reading “मेरे सर, उसके पैर”
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मनाऊ जश्न या हो जाऊ शर्मसार?
दे दिया मैंने उसे सब कुछ ये सोच कर, कि वो मुझसे बेपनाह प्यार करता है। प्यार तो उसे सिर्फ अपने आप से था, दुसरो का तो वो सिर्फ कारोबार करता था। पर क्यों नहीं समझ पाया मै उस वक्त? शायद आँखों में मेरे उसने लहू भर दिया था। जिसे भी देखता सिर्फ काफिर हीContinue reading “मनाऊ जश्न या हो जाऊ शर्मसार?”
अरे आईने
कई बार रिश्वत देकर देखी आईने को,हर बार सिर्फ नाकामी ही नज़र आयी।ऐसा भी क्या मांगा मैने,कुछ दाग ही तो छुपाने की मिन्नत की थी। अरे आईने कुछ सिख मेरी माँ से,कितने जख्म छुपाती है मुझसे।कभी नहीं कहती मै मिलने नहीं आया,ज़माने को मेरी व्यस्तता की दुहाई जो देती है। बहन भी नाज करती हैContinue reading “अरे आईने”
ऐ मालिक
ऐ मालिक सब कहते है बहोत मज़बूत हु मै , सही है जब लड़ाई मेरी खुद की होती है। वरना दर्शक दीर्घा में बैठ कर लड़ाई देखना, मजबूती नहीं मज़बूरी होती है। अपनी माँ का सच्चा लाल नहीं मै, अगर रण छोड़ भाग जाऊ कभी। पर बुजदिलो से कोई कैसे लडे, नकाब पहने जो वोContinue reading “ऐ मालिक”
वजूद
मुहब्बत किसी और से नहीं खुद से ही होती है, क्यों की वो कराती है अहसास खुद के वज़ूद का। किसी और का होना तो बस एक बहाना होता है , ज़माने की नज़र में एक पैमाना होता है। इसीलिए मुहब्बत करने से पहले एक बात याद रखना, दिल कभी टूटते नहीं, वजूद टूट जातेContinue reading “वजूद”
उपरवालो को नीचेवालो का सहारा
जब से मेरे मरने का पता चला था,मेरे घर आने वालो का ताता लगा था।कोई रो रहा था, कुछ कोशिश कर रहे थे ,परन्तु चिंता के भाव सबके मुँह पर झलक रहे थे। चिंता नहीं थी किसी को मेरे परिवार की ,चिंता तो थी मेरे अंतिम संस्कार की।लाश को जलाये या दफनाए विषय गहन था,मैContinue reading “उपरवालो को नीचेवालो का सहारा”
नेताजी का चिंतन
स्वतंत्रता दिवस की सुबह जिन नेताजी ने झंडा फहराया, फिर महापुरुषों याद में भावनाओ भरा भाषण सुनाया। वे ही नेताजी शाम को पार्टी में बतिया रहे थे, हस हस कर चेलो को महापुरुषों की बेवकूफी समझा रहे थे। बोले बेकार ही भगत सिंह फांसी पर चढ़े थे, कल मांगेगे खालिस्तान उन्हें न पता था। वरनाContinue reading “नेताजी का चिंतन”
रुह
उनके न मिलने का रंज करू, या मनाउ जशन उन सुनहरी यादो का? इजहार ऐ मुहब्बत हमने न की थी, तो गुनहगार उन्हें ठहराऊ कैसे? मुझे अपने होने का पहला अहसास जिसने कराया, ज़माने की भीड़ में जिसने मुझे अपने आप से मिलाया । उससे शिकवा करू इतना मै खुदगर्ज़ नहीं, उनकी जगह सजदे मेंContinue reading “रुह”
वो गलिया
बचपन की वो गलिया आज भी वही है, बस हम लोग दूर और कही है। हा कुछ रास्ते जरूर हो गए है चौड़े, अब वो मैदान भी नहीं जहा थे हम कभी दौड़े। कुछ इमारते ज़रूर ढह गयी है, चार आने की गोली वाली दुकान भी अब नहीं है। वो चौराहा भी कुछ बदला बदलाContinue reading “वो गलिया”
बक्श दो यमराज
खुले नहीं है मंदिर, न ही मस्जिदे खुली है, बंद है गिरिजे, गुरद्वारे भी बंद है । आज जब सबसे ज्यादा जरुरत है हमें , तो क्यों इन सबके हात तंग है। इनके नाम पर मरने मारने पर उतारू रहने वाला इंसान, कैसे आज मान बैठा डॉक्टर को ही अल्ला, गॉड और भगवान। बक्श दोContinue reading “बक्श दो यमराज”