एक सवाल खुदा से

ढूंढता है हर कोई ऐसा जो उसका बोझ हल्का कर देथक गए है सब अब अपनी लाश उठाये हुए।उठते जरूर है कुछ कंधे सहारा देने दुसरो को,पर उनकी सिसकियों से धड़कने लौट आती है। फिर होती है अजीब सी घबराहट धड़कनो के लौटने से,भूल चुके होते है जिन जख्मो को, क्या वे फिर दर्द देगी?पहलेContinue reading “एक सवाल खुदा से”

कैसे जिया जाये?

कौन कहता है कल एक होता है,बिते भी कई होते है, और आने वाले भी कई।कुछ कल होते है जो बस ठहर जाते है,मानो सूरज ने उगना बंद कर दिया हो जैसे। हलाकि हर रात के बाद सुबह होती है,पर कुछ कटती है सालो में कुछ चलती है सदियों तक।नहीं होना चाहिए ताल्लुक इस दरमियानContinue reading “कैसे जिया जाये?”

ये ऐसा है वो वैसी है

ये ऐसा है वो वैसी है, आसानी से राय बना लेते है लोग,  खुद से अनजाने मगर गैरो की तस्वीर बना लेते है लोग।   जिन्हे कभी फुर्सत नहीं मिलती भीतर झाकने की,  अक्सर वो ही जुर्रत करते है बाहर ताकने की।   “आँखों देखि कानो सुनी” ने कइयों को गुमराह किया है, इंसानो की छोड़ो इसनेContinue reading “ये ऐसा है वो वैसी है”

पत्थर और नकाब

शीशे के घरो में रहकर वो ही पत्थर फेंकते है,जो नकाब पहनकर आईने देखते है।पत्थरो के रुख तो फ़िज़ा के साथ बदल जाते है,फेकने वालो की ही वो अक्सर नकाब गिराते हैं।

प्यार और पसंद

प्यार ही पसंद हो जरुरी तो नहीं,पसंद जो ख्वाहिशो की गुलाम होती है।प्यार तो ताउम्र वही रहता है,ख्वाहिशे अक्सर बदल जाती है। जो होता प्यार अकेली ख्वाहिश,तब वो कैसे पहला या दूसरा होता।वीरान हो जाते मयखानेऔर गझल का नामो निशान न होता। ख्वाहिशे खुद ही की हो,ये भी कहा मंजूर ज़माने को।इंसान को सामान बनाContinue reading “प्यार और पसंद”

अंतर

चमक दमक और खूबसूरती में वही अंतर होता है,जो ईमारत की लीपा पोती और नीव में होता है।रंगो की परते दरारों को छुपाती है, बुझाती नहीं,और वो भी उनसे कहाँ जिनकी नज़रे होती है सही?पर अगर नजर से जो हर कोई जोहरी बन जाता,तब क्या फिर कोई पत्थर कभी हिरे की जगह ले पाता?खुशबू जिस्मContinue reading “अंतर”

किसका गुनाह?

ऐ मालिक क्यों तू किसी के भीतर प्यार जगाता है, मुकाम से पहले फिर क्यों तू उन्हें जुदा करवाता है?   कहते है जुदाई का दर्द नासूर बन जाता है, तो फिर क्यों मर्ज को कातिल में ही हकिम नजर आता है? सिर्फ दिमाग से ही था अगर जिंदगी चलाना, फिर ऐ मालिक नहीं चाहिए थाContinue reading “किसका गुनाह?”

लाश की चिंता

एक लाश लगी थी क़तार में,इंतजार था अपनी बारी का।गहरी चिंता में डूबी थी,ऊपर से अकेलापन खाये जा रहा था। कुछ रिश्तेदार जरूर थे साथ,सफ़ेद चादर ओढ़े उसी क़तार में।जो जिन्दा थे वो भी लगे थे क़तार में,कुछ अस्पताल के तो कुछ ऑक्सीजन के इंतजार में। लाश को चिंता जलाये जा रही थी,चिता नसीब होगीContinue reading “लाश की चिंता”

नया रोग

आदमी के लाश बन जाने पर रोष नहीं,लाशो की खबर बन जाने पर एतराज है।ये कैसा दौर है जनाब, ये कैसे लोग है?शायद क़त्ल की तरफदारी एक नया रोग है। कोरोना का क्या कल वो चला जायेगा,जलती चिताओ का दौर भी थम जायेगा।पर इस नए रोग से हमारा जमीर मर जायेगा,बिना इंसानियत का इंसान कैसेContinue reading “नया रोग”

संस्कारो को मत भूल जाना (व्यंग्य )

यदि मै जब कभी संक्रमित हो जाऊंगा,शायद अपने को डॉ अली के अस्पताल में पाउँगा।मेरी ऑक्सीजन का स्तर जो गिर जायेगा,बेटा दौड़कर सिस्टर मारिया को बुलाएगा। यदि मेरे साथ मेरी पत्नी भी संक्रमित हो जाएगी,मेरे परिवार को तब गुरुद्वारे के लंगर की याद आएगी।भगवान न करे पर जब मेरी सांसे उखड जायेगी,मेरे बेटे को अपनेContinue reading “संस्कारो को मत भूल जाना (व्यंग्य )”