
एक लाश लगी थी क़तार में,
इंतजार था अपनी बारी का।
गहरी चिंता में डूबी थी,
ऊपर से अकेलापन खाये जा रहा था।
कुछ रिश्तेदार जरूर थे साथ,
सफ़ेद चादर ओढ़े उसी क़तार में।
जो जिन्दा थे वो भी लगे थे क़तार में,
कुछ अस्पताल के तो कुछ ऑक्सीजन के इंतजार में।
लाश को चिंता जलाये जा रही थी,
चिता नसीब होगी या कोई नदी नाला।
डर नहीं था उसे चील कव्वो के खाने का,
खयाल था तो बस ‘अपनों’ की प्रतिमा बचाने का।
बेबाकी से भाव अभ्व्यक्ति के लिए बधाई !
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