
कभी न खत्म होनेवाले इम्तेहानों से थककर
एक दिन भाग जाना चाहता था वो रण छोड़कर।
तभी दस्तक दी जिंदगी ने जिम्मेदारियों की गठड़ी लिये,
जगाकर अपराध के बोध को ला खड़ा कर दिया फिर रेस में।
शायद शक था जिंदगी को उसके जिम्मेदार होने पर,
इसीलिए वास्ता दे दिया हर इम्तेहान से मिले तजुर्बो का।
हिम्मत जुटाकर उसने भी एक सवाल कर दिया जिंदगी से,
क्या करू तजुर्बो का ए जिंदगी, जब तू जितने ही नहीं देती।
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