
मै जो नास्तिक बन जाऊ तो इल्जाम तेरे सर होंगा,
फरियाद पर फरियाद, और तू है कि दर्द कम ही नहीं करता ।
नाक़बुली के लिए तू गिना सकता है खामियां मेरी,
पर न जो होती खामियां तो क्या मै खुद खुदा नहीं होता?
एक जद्दोजहद सी है मेरी आस्था और तेरी बेरुखी में,
देखते है कौन टूटता है पहले।
पर मुझे हराकर तू कैसे जित पायेगा,
इसी खयाल से हर सुबह फिर आस्तिक बन जाता हु।