
जो छूने को बेताब हो वो रूह का प्यार नहीं,
वो तो बस एक एहसास है किसी के खास होने का।
जो बसा लेते है किसी को अपने दिल में,
बाहर नहीं, उनकी दुनिया होती है खुद अपने भीतर।
वो मोहताज नहीं होते आँखों से देखने के लिए,
न ही जरुरी आवाज का उनकी कानो में पड़ना।
बस उसका होना ही काफी होता है उन्हें सुकून पाने के लिए,
वो भी बाहर कही और नहीं बस अंदर अपने दिल में।
बंदिशे लगायी जा सकती है देखने और सुनने पर,
पर भला कोई रोक पाया है किसी को चाहने से ?
बहोत खुद्दार होता है रूह का प्यार
चलता है सांसो के साथ पर वो भी बस खुद अपनी।
बड़ा सुकून भरा होता है प्यार रूह का,
इसमें पाने की ख्वाइश जो नहीं होती।
जब भी जी चाहे उससे मिलने को,
आईने के सामने खड़े हो जाते है लोग।