
ऐ कसक, कायल हु मै तेरी वफ़ा का,
एक तू ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।
कद से नापकर उचाई जिन्हे कल बौना बुलाते थे,
पैमानों के बदलते ही वो आज ऊंचे नज़र आते है।
कल जिन्हे टाल देते थे बच्चा कहकर,
आज जब है चर्चा उन्ही की उम्र के ठहराव की।
साइकिल से लेकर हवाई जहाज तक,
एक कसक ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।
कल जो मिजाज बेरंग कहलाते थे,
आज उसे सादगी कह कर दाद देते है।
बदल जाते है दौर राजा के भी और रंक के भी,
एक कसक ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।
सिफारिश जिनसे किया करते थे कभी,
आज वो खुद सिफारिश लिए आते है।
न उनका कल आज रहा, न होगा मेरा आज कल,
एक कसक ही है जो साथ नहीं छोड़ती कभी।
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