
ढूंढता है हर कोई ऐसा जो उसका बोझ हल्का कर दे
थक गए है सब अब अपनी लाश उठाये हुए।
उठते जरूर है कुछ कंधे सहारा देने दुसरो को,
पर उनकी सिसकियों से धड़कने लौट आती है।
फिर होती है अजीब सी घबराहट धड़कनो के लौटने से,
भूल चुके होते है जिन जख्मो को, क्या वे फिर दर्द देगी?
पहले तो दर्द के अहसास पर अकेले रो लिया करते थे,
अब दुसरो को रुलाने का पाप होगा हर किसी के सर।
अक्सर जो दामन थमाता है तु पोछने किसी की आँखे,
या खुदा क्यों वो खुद आंसुओ में सरोबार होता है ।
न तू बेदर्द जीने देता है और न ही सुकून से मरने,
क्या हमारी खता ही ज्यादा है या कमी है तेरी रहमत में?
waah !
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