
प्यार ही पसंद हो जरुरी तो नहीं,
पसंद जो ख्वाहिशो की गुलाम होती है।
प्यार तो ताउम्र वही रहता है,
ख्वाहिशे अक्सर बदल जाती है।
जो होता प्यार अकेली ख्वाहिश,
तब वो कैसे पहला या दूसरा होता।
वीरान हो जाते मयखाने
और गझल का नामो निशान न होता।
ख्वाहिशे खुद ही की हो,
ये भी कहा मंजूर ज़माने को।
इंसान को सामान बना देते है,
यहाँ ज़माने को दिखाने को।
बहुत खूब
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