
चमक दमक और खूबसूरती में वही अंतर होता है,
जो ईमारत की लीपा पोती और नीव में होता है।
रंगो की परते दरारों को छुपाती है, बुझाती नहीं,
और वो भी उनसे कहाँ जिनकी नज़रे होती है सही?
पर अगर नजर से जो हर कोई जोहरी बन जाता,
तब क्या फिर कोई पत्थर कभी हिरे की जगह ले पाता?
खुशबू जिस्म की है या इत्र की कहाँ हर कोई जानता है,
यहाँ हर कोई सिर्फ फ़िज़ा के रुख को पहचानता है।
फ़िज़ा के साथ बह जाने में जो समझदारी मानते है,
कहते है ज़माने के उसूलो को सिर्फ वही पहचानते है।
पर होते है कुछ जो फ़िज़ा का रुख मोड़ देते है,
देर से ही सही पर वो आखिर ज़माने को पीछे छोड़ देते है।
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