मेरे पुरखो का देश

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भक्तिरस से तृप्त होकर जैसे ही मै सो गया,
खुशहाल चमन के सपनो का दौर शुरू हो गया।
जब किसी विघ्नसंतोषी ने मुझे जगाया,
मैंने अपने आप को किसी और स्थान में पाया।

यहाँ मित्रो में होड़ लगी थी, कौन क्या बेचेगा,
बेचने वाले निश्चिन्त थे मै भला क्या सोचूंगा।
इसीलिए वे काफी कुछ मुफ्त में बाट रहे थे,
मेरी सहमति से ही वो मेरी जेब काट रहे थे।

रोजी रोटी के लिए नहीं था कोई आंदोलन,
भाषा, जाती, धर्म का था ज़बरदस्त सम्मोहन।
समूहों के झुंड में मै मेरा देश ढूंढ रहा था,
क्या यही है वो जिसे मेरे पुरखो ने देश कहा था ?

Published by Vasant V. Bang

I am a human being with all shades and imperfections. A management educator and advisor by profession I realized pretty late in life that my true calling is expression of human feelings, and hence this blog.

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