
धर्म, जात, पंथ के नाम पर उन्होंने बाट दिया समाज को,
कल बाट देंगे फिर वो इंसान के जिस्म और जान को।
यदि लड़ जाएंगे अंग एक दूसरे से,
क्या हम जी पाएंगे सुकून से?
यदि सर को ह्रदय से ऊपर मानेंगे,
तो फिर हम दुसरो का दर्द कैसे जानेंगे?
हाथ कमाते है तो कंधो से ज्यादा अहम् रखेंगे?
फिर तो किसी और का सहारा बनना ही हम छोड़ देंगे।
पैर जो चलाते है हमे तो ज्यादा महत्व देंगे,
पर रीढ़ को दुय्यम मानने पर हम कैसे खड़े रहेंगे?
बोलने की बजाय सुनने का वो गुणगान करेंगे,
जुबान की जगह कान की महत्ता का बखान करेंगे।
वो तो हमारी दोनों आँखों को एक दूसरे से लड़ा देंगे,
देखने की जरुरत ही क्या है ये समझा देंगे।
यदि हमारे आंख, नाक, कान ही आपस में भीड़ जायेंगे,
हम ज़िंदा भी है या मुर्दा, ये भी न समझ पाएंगे।
ऐसे स्थिति में, जिंदा या मुर्दा.. फर्क क्या जब “जावन” का अर्थ ही बिखर गया..
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Agree!!! Thank you Sir.
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