
ऐ मालिक सब कहते है बहोत मज़बूत हु मै ,
सही है जब लड़ाई मेरी खुद की होती है।
वरना दर्शक दीर्घा में बैठ कर लड़ाई देखना,
मजबूती नहीं मज़बूरी होती है।
अपनी माँ का सच्चा लाल नहीं मै,
अगर रण छोड़ भाग जाऊ कभी।
पर बुजदिलो से कोई कैसे लडे,
नकाब पहने जो वो घूमते है।
ऐ मालिक मजबूत सीने में नरम दिल देना,
क्या यह नाइंसाफी नहीं है तेरी?
घाँव सीने पर खाने से नहीं मै कतराता,
पर क्या करू उस घाँव का जो दिल में उतर जाता।
ऐ मालिक बता क्यों बांधे हात मेरे,
बांधने को क्या दिल और दिमाग कम था।
वरना निकाल चूहों को बिल से,
फिर पूछ तेरे बन्दे में क्या दम खम कम था।
सब कहते है तेरे घर देर है, अंधेर नहीं ,
चिराग जलने तक सांसे भी चलाता है तू यह भी है सही।
पर इस दरमियान के दर्द जो दिल को छलनी कर देंगे,
कौन होगा जिम्मेदार अगर ये दिल की नरमाई को कम कर देंगे?
जबरजस्त
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