
बचपन की वो गलिया आज भी वही है,
बस हम लोग दूर और कही है।
हा कुछ रास्ते जरूर हो गए है चौड़े,
अब वो मैदान भी नहीं जहा थे हम कभी दौड़े।
कुछ इमारते ज़रूर ढह गयी है,
चार आने की गोली वाली दुकान भी अब नहीं है।
वो चौराहा भी कुछ बदला बदला सा लगता है,
पर आज भी वहा जाते ही समां सा बंधता है।
हा नक़्शा जरूर बदला है मेरी शहर की गलियों का,
पर हर गली से जुडा है नाम मेरे दोस्त और सहलियों का।
जाना चाहिए उन गलियों में कभी कभार अपने आप से मिलने,
बड़ा सुकून मिलता है फिर से नासमझ बनने में।
Nostalgia!
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बहुत खूब।💕
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Thanks
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🌷👍
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Banguji, great to know this poetic facade of your personality. All it comes with spending precious time with ourself and being away from mundane matters.
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Thanks Antuji.
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सुन्दर..
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