मेरा कसूर !

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क्या हम जानते है जो हम आज करेंगे,

उसकी कीमत हमारे ही पोते पोती कल भरेंगे।

अगर करेंगे हम समर्थन दंगाइयों का लेकर ‘धर्म’ का नाम,

कल वे ही बुलाएँगे हमारे पोते को कहकर है अपने ‘पंथ’ का काम।

जब धर्म और पंथ के मुद्दे कमजोर पड जायेंगे,

तब कोई नेताजी ‘जाती’ का झंडा लहरायेंगे।

दूसरे नेताजी फिर ‘भाषा’ का मुद्दा उठाएंगे,

अस्मिताओं की होली में औरो की बलि चढ़ाएंगे। 

इस अस्मिता युद्ध में अगर मेरा पोता मारा जाएगा,

किसी नेता की नज़र में वो शहीद कहलाएगा। 

जब मेरा बेटा उसके बेटे की मौत पर बैठा होगा आँसू बहाते,

नेताजी अपने बेटे के साथ दूर विदेश में दिखाई देंगे पार्टी मनाते।

पर मेरी बहु नेताजी से ज्यादा कसूरवार मुझे ठहराएगी,

अपने खुद के पोते की हत्या का इल्जाम मुझ पर लगाएगी। 

पूछेगी, जब मच रहा था बवाल  आप कैसे सो रहे थे,

कही ऐसा तो नहीं दूसरे के जलते घरो पर आप खुश हो रहे थे । 

आज जब आपके पोते की लाश यहा पड़ी है,

आपकी बहु सामने प्रश्न लिए खड़ी है। 

आपकी झूठी मर्दानगी ने मुझसे मेरा बीटा छीन लिया,

हमारे ‘आज’ का फैसला करने का हक आपको किसने दिया। 

Published by Vasant V. Bang

I am a human being with all shades and imperfections. A management educator and advisor by profession I realized pretty late in life that my true calling is expression of human feelings, and hence this blog.

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