कुछ सवाल अपने आप से

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आज हमारे घर में कोई भुखमरी का शिकार नहीं है, 

क्योंकि खेत खलिहानो में कोई पसीना बहाता है। 

आज हम नंगे हो तो भी वैसे दिखाई नहीं पड़ते, 

क्योंकि कोई हमारे लिए कपडे बुनता है।  

क्या अहसास है हमें की हम जीन घरो में ऐशो आराम से रहते है, 

उनके लिए सीमेंट की बोरियों उठाई है कईयो ने अपने कंधो पर।  

देश विदेश की सैर सपाटे कर हम फिर जमींन पर उतर पाते है, 

उन्ही के द्वारा बनाये गए हवाई अड्डों पर।  

दिवाली, ईद, क्रिसमस और बैसाखी पर हम घर जा पाते है,

क्योकी रेल की पटरिया बिछा रखी है किसीने।   

आज जिसके सीने पर हम गाड़िया दौड़ाते है शानो शौकत से, 

वोह सड़के बनी है किसी के खून पसीने से।  

हममे से कुछ लोग सेठ और उद्योगपति कहलाते है,

क्योंकि मशीनो पर घिसते है कई कारखानों में। 

शादी समारोहों में हम हिरे जवाहररात चमकाते है, 

क्योंकि जान जोखिम में डाल कर उतरते है कुछ खदानों में।  

मई की चिलचिलाती धुप में जब वोह निकल पड़े है पैदल, 

क्या हमें उनमे अपने बच्चे और बूढ़े माँ बाप नहीं दिखाई दिए?

चार छे महीने की तन्खा भी न दे पाए, 

क्या इतने भुक्कड़ हम हो लिए? 

देश निर्माण करने वालो से इस बदसलूखी को क्या कहे?

जो उनका किया नहीं, उसकी सजा वो क्यों सहे ?

क्या उनको इन हालातो में छोड़ देना देशद्रोह नहीं है?

यदि इन हालातो में कोई हमें पाखंडी कहे तो बिलकुल सही है।

सालगिरह

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वो हमारी सालगिरह पर मुबारकबाद देने नहीं आयी,

किसी और की महफ़िल जो आबाद हो रही थी। 

पर यह हमारा दावा है की गर जनाजा जो हमारा निकला,

तो वो पहले हमारी कब्र पर आएगी। 

हमें दफनाए सिवा वो कही और नहीं जाएगी। 

यु तो हर सालगिरह पर हमारी जिंदगी से एक साल चला जाता है,

पर गम कैसा उनसे मिलने का लम्हा तो पास आता है।

यही सोचकर हम साल दर साल अपनी सालगिरह मनाते है,

अब तो हर पल बस खुदा से यही मिन्नत माँगते है,

या खुदा मौत हमें ऐसे वक्त न देना की उनकी महफ़िल में गैरत पड़े,

जीते जी तो उन्हें हमसे गिला रहा, हमारी मौत पर तो उन्हें सुकून मिले।

पहला प्यार

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झूठे है जो कहते है प्यार सिर्फ एक बार होता है,

प्यार तो प्यार है कई कई बार होता है। 

पर यह भी सच है की वो खास होता है,

जब किसी को प्यार पहली बार होता है। 

नासमझ ना भी हो तो पूरी समझ भी होती नहीं,

पर उसे कौन अच्छा लगता है यह समझता है हर कोई। 

अच्छा लगने लगे कोई इसका कारण ज़रूरी नहीं,

बस लगने लगती है उसकी हर चीज सही। 

पहली बार दिल की धड़कनें बिगड़ने का अहसास होता है,

उसके आँखों से ओझल होते ही दर्द का आभास होता है।

पागल ना हो जाऊ इस बात से डरने के बजाय दिल झूमने लगता है,

पहली बार किसी अनजानी तस्वीर को चुमने लगता है।

किसी अनजाने के चाहने में एक खुमारी होती है,

उसे पाने की चाहत में कुछ भी कर गुजरने की तैयारी होती है। 

शायद यह पहला अहसास होता है बगैर शर्तो के प्यार का,

कुछ खास ही होता है इंतजार इकरार का।

मिल जाए जो ‘उससे’ नज़र तो बस समां बंध जाता है,

गर हो जाए एतबार तो फिर कोई और नज़र ही नहीं आता है।  

वासना का जब दूर दूर तक भी न हो खयाल,

फिर भी मिलने को दिल तड़पे यह होता है पहला प्यार।

दौर

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जहा आकर रुक गए थे कुछ के दौर,

उसी वक्त शुरूवात कर रहे थे कुछ और।

जीतनी उम्र थी उनकी, जब उनके दौर ख़त्म हुए,

उससे ज्यादा उम्र के तो आज हमारे दौर हो गए।

आज जब हम उपरी पायदान पर चढ़ गए,

तब भी कहा हमारे दौर बंद हुए।  

यह कहना हमारा घमंड नहीं, है यह हमारा मरहम,

लाख दबाये दर्द दिख ही जाता है गहरी जो है जख्म।

किसी का दिल दुखाना यह नहीं हमारा मकसद,

पायदानो की उचाईयो से हमें न तोले बस यही रही हसरत।

आज यह हम किसी और से नहीं अपने आप से बोलते है,

हमारा वजन हम किसी और के नहीं अपने तराजू से तौलते है।

मास्क

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मास्क पहनने के लिए वायरस को क्यों बदनाम करते हो,

बिना मास्क हम जी ही नहीं सकते, कहने से क्यों डरते हो। 

भीतर के बच्चे को छुपाने के लिए ‘बडे’ हो जाने का मास्क आता है,

कोई ज़िन्दगी भर नादान बना रहे ज़माने को कहा सुहाता है। 

पहले बेटा, फिर पति, फिर बाप वाला मास्क पहन लिया,

अब तो हालत यह है की आईने ने भी हमें पहचानने से इंकार कर दिया। 

सिर्फ एक मैखाना ही है जहा हम बगैर मास्क नज़र आते है,

इस लिए तो जाम और साकी का क़र्ज़ कभी नहीं चूका पाते है। 

मेरा कसूर !

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क्या हम जानते है जो हम आज करेंगे,

उसकी कीमत हमारे ही पोते पोती कल भरेंगे।

अगर करेंगे हम समर्थन दंगाइयों का लेकर ‘धर्म’ का नाम,

कल वे ही बुलाएँगे हमारे पोते को कहकर है अपने ‘पंथ’ का काम।

जब धर्म और पंथ के मुद्दे कमजोर पड जायेंगे,

तब कोई नेताजी ‘जाती’ का झंडा लहरायेंगे।

दूसरे नेताजी फिर ‘भाषा’ का मुद्दा उठाएंगे,

अस्मिताओं की होली में औरो की बलि चढ़ाएंगे। 

इस अस्मिता युद्ध में अगर मेरा पोता मारा जाएगा,

किसी नेता की नज़र में वो शहीद कहलाएगा। 

जब मेरा बेटा उसके बेटे की मौत पर बैठा होगा आँसू बहाते,

नेताजी अपने बेटे के साथ दूर विदेश में दिखाई देंगे पार्टी मनाते।

पर मेरी बहु नेताजी से ज्यादा कसूरवार मुझे ठहराएगी,

अपने खुद के पोते की हत्या का इल्जाम मुझ पर लगाएगी। 

पूछेगी, जब मच रहा था बवाल  आप कैसे सो रहे थे,

कही ऐसा तो नहीं दूसरे के जलते घरो पर आप खुश हो रहे थे । 

आज जब आपके पोते की लाश यहा पड़ी है,

आपकी बहु सामने प्रश्न लिए खड़ी है। 

आपकी झूठी मर्दानगी ने मुझसे मेरा बीटा छीन लिया,

हमारे ‘आज’ का फैसला करने का हक आपको किसने दिया। 

गुब्बारा

हर आदमी है केवल एक गुब्बारा,

जो जब दिखे ऊँचा लगे सबको प्यारा।

गुब्बारे की ऊंचाई नापना गलत नहीं,

पर गुब्बारे में हवा किसने भरी उससे लगता है अंदाज़ सही।

उधार के फेफड़े गुब्बारो को जल्दी ज़रूर उड़ाते है,

पर सूद ना चुकाने पर उतनी ही तेज़ी से ज़मीं पर भी लाते है।

पर फेफड़ो की मालकियत पहचान पाना आसान नहीं होता ,

वरना हर इंसान ऊंचाई और गहराई मे फरक समझता।

चमकना या चमकाना ?

चका चौंध सबकी होती है,

सवाल सिर्फ होता है: कैसे और कब। 

कोई चमकाता  है बाप के नाम और दाम से,

कोई चमकता है खुद के काम से। 

जब कुछ इतराते फिरते थे पुश्तैनी दम पर,

तक़दीर बनाने का जिम्मा था खुद हम पर। 

किसी रोज हमारी साईकिल को एक मोटरबाइक ने क्या हरा दिया,

गुस्से में आकर हमने बाइक चलाना छोड़ बनाना ही सिख लिया। 

जब मोटरबाइक चमकाया करते थे कई,

हमें लगता था इंजिन डिज़ाइन सीखने चक्कर में हमारी जवानी बेकार ही गयी। 

जब कॉलेज में हम किसी को बाइक पर नहीं बिठा पाए,

तो ठान लिया करीयर की शुरुवात बाइक बनाने वाली कंपनी से ही की जाए। 

मंज़ूर न था हमें की चमकने के लिए किसी और के कंधो पर खड़े हो,

हमेशा चाहते थे हमारी मंज़िल के पैर हमने खुद घड़े हो।   

दुनिया हमें अपने नाम से जाने यही था एक सपना,

आज मंज़िल ही नहीं मुकाम भी है अपना। 

उस वक्त चमकने वाले आज भी उन्ही गलियों में घूमते है,

अपनी पुरानि शान की निशानिया ढूंढते है।

आज देख कर हमें  शायद आपको यूं लगे की हम अब इतराएँगे,

मगर गौर से देखिये आज भी हमारे पैर आपको ज़मीं में गड़े नज़र आएंगे।

अव्यक्त

उनके जाने की खबर सुन कर दिल का कांप जाना,

और ऊनको सामने पाते ही सांसो का तेज तेज चलना।

उँगलियों का थरथराना और होंठो का कंपकपाना,

जुबा का लड़खड़ाना, और शब्दों को भूल जाना।

क्या यह किसी बात का अंदेशा है,

कोई कहता है यह हमारे दिल का छुप्पा संदेसा है.

पर आप है की इसका मतलब नहीं जानती,

या फिर जानकर भी इसे नहीं पहचानती।

पहचानती भी क्यों, आपकी सूरत जो कईंयों को प्यारी है,

हम पर तो आपकी सीरत की खुमारी है.

हां आज यह सब साथ निभाने की कस्मे खाएंगे,

पर बदलते ही तुम्हारी जुल्फों का रंग यह भी बदल जाएंगे।

तब शायद तुम्हे मेरी याद आएगी,

पर उस वक्त तुम्ह मुझे कही और पाओंगी।

लाख पटक लोंगी तुम सर पर मैं नहीं लौटूंगा,

भला मेहबूबा मौत का दमन मै कैसे छोडूंगा।