
कल जब मै निकल पड़ता था
तलाश में अनजानी ख्वाहिशो के
मुस्कुरा देता था दीदार ऐ चाँद पर
मायूस भी हो जाता उसके न निकलने पर
फिर संभाल लेता अपने आप को
सोच कर की समय ही तो है
रुकेगा थोड़े, फिर कल रात होगी
पहेलियों को बनाता और बुझाता
मै चलता रहा हाथ थामे समय का
आज थकने लगे है पैर मेरे
पर दिल और दिमाग कहा रुकते है
चलते ही रहते है हर घडी अथक
तलाश में नयी ख्वाहिशो के
पर अब नहीं घबराता मै बादलो से
अमावस के सच को भी जानता हु
ये छिपा भर सकते है कुछ देर के लिए
पर मिटा नहीं पाते चाँद को कभी
उल्टा टूट कर बरसते तो बादल ही है
चाँद तो अडिग है ज्यों की त्यों
सराबोर शुभ्र मद्धम रोशनी में