
बहोत कुछ होता है हर किसी का हर किसी के साथ,
बीवी, बच्चे, भाई, बहन और माँ बाप के साथ,
पर होता है जिंदगी का कुछ हिस्सा ऐसा भी ,
जिसको बाटा होता है बस कुछ खास दोस्तों के साथ।
बनते बनते कभी बेटा, तो कभी बाप, तो कभी पति,
भूल जाते है हम अपने आप ही को।
हर किसी को दे देने के बाद उनका हिस्सा,
कभी ख्वाहिश होती है अपने उस हिस्से की।
मिल लिया करो यारो लिये अपने उन खास हिस्सों को,
भूलकर सब कुछ की ‘कौन’ और ‘क्या’ है हम।
बाटने को खुशिया और ज़माने को रौब तो हज़ारो मिल जायेंगे,
हसते हसते रो सको जिसके साथ वो दोस्त कहा से लाएंगे ।
वक्त न रुका है, न रुकेगा कभी,
वो स्कूल, वो गलिया, वो नुक्कड़, सब वही ठहरे होंगे जहा थे वही।
पैसा भी होगा, होगा कारोबार भी, शोहरत भी होगी शायद
बस नहीं होंगे कल तो, यार बस मै और तुम।
वसंत बंग
पुणे, सप्टेंबर ६, २०२४