
विश्वास कर लेता हू ये सोचकर,
कभी तो तू इंसाफ करेगा.
पर माफ नही कर पाऊंगा,
भरोसा जब कभी ये टूटेगा.
हर दर्द को सह जाता हू ये सोचकर
कि शायद सजा होगी किन्ही अनदेखे गुनाहों की
पर तभी सवाल कौंध जाता है मेरे मन मे,
उनका क्या जो सरेआम गुनाह किये जाते है.
सोचता होगा तू शायद कि क्या हि कर लूंगा मै,
इंसान जो समझता है तू मुझे.
भूल जाता है तू शायद कि तेरे खुदा होने के लिये
जरुरी है हम इबादत करने वालो का होना.
बहोत आसान है तेरा मुझसे सवाल करना,
कि क्या भरोसा नही है मुझपे.
पर थक कर मै भी आज पुछता हू,
तू खुदा है भी या नही?