
जब कभी गलती से मूड जाता हु पीछे,
यकीं नहीं होता खुद अपने पदचिन्हो पर ।
कुछ चीज़े ऐसी जिसका जादू सर चढ़ कर बोलता था,
और कुछ ऐसी जिसे तवज्जो नहीं देता था मै ।
आज वो जादू कम छलावा ज्यादा लगता है,
दिखने और होने में फर्क जो समझने लगा हु ।
जो चीज़े आज ओझल नहीं होती बंद नज़रो से
खुली नजरो से कल उसे नजरंअदाज किया था मैंने ।
मेरी नजर को जो नजर लग गयी थी किसी की,
वक्त की ठोकरों ने उतार दिया उसे शायद ।
देखने लगा हु आरंभ और अंत के बीच का पथ
धुंध जो छट गयी है उतार और चढ़ावो से ।