
कोई इजहार न कर पाया, इंतजार किसी को मंजूर न था,
कल के वही काश तो रंगीन बनाते है आज की शाम को।
मत कोस इन तन्हाइयो को, मयखाने तो शुक्रगुजार है इसके,
दिलजलों के बिना भी कही महफ़िल सजा करती है।
अजीब है ये मयखाने, मिला देते है हर किसी को उस किसी से,
साकी में सुकून ढूंढने का हुनर जो मिलता है वहां।
पर मत मिलना साकी से कभी बिन पिए, बाहर मयखाने से,
वरना अपने दर्द, उसकी तन्हाइयो से बौने नज़र आएंगे ।