मर्ज – ऐ – इश्क़

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किसी के मिलने से भला किसी के बिछड़ने का दर्द कम होता है?
मान तो लेता है दिल पर न जाने क्यों भूल नहीं पाता।
दर्द के बदले दर्द ये इलाज नहीं मर्ज – ऐ – इश्क़ का,
सच्चा इश्क़ रुलाता जरूर है पर कभी कम नहीं होता।

एक टीस सी उठती है जब भी खयाल आता है उस गुजरे हुए ज़माने का ,
सोचता हु क्या कोई फर्क पड़ता था मेरे होने और न होने का?
ए जिंदगी हर बार जब तू मिलाती है मुझे बीते हुए कल से,
तू शायद भूल जाती है अब मुझे फर्क नहीं पड़ता तेरे होने और न होने का।

Published by Vasant V. Bang

I am a human being with all shades and imperfections. A management educator and advisor by profession I realized pretty late in life that my true calling is expression of human feelings, and hence this blog.

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