
सोचना जरूर हवा देने से पहले आग को,
न करना शक कभी वफ़ा पर इसकी।
जो जलाने के लिए भेज देते है उसे कही,
आग वापस उन्ही के पास लौट आती है।
मुश्किल होता है पहचानना जब वो लौटती है,
ये आग अपनी है, या परायी किसी और की?
जरुरी नहीं कि वो मिले लौट कर खुद हमी से,
लिपटते देखा है उसे अक्सर अगली पुश्तों से।
हवा की फितरत होती है बिलकुल अलग,
वो ठहरती नहीं कभी किसी के पास।
न कर मोहब्बत हवा से, न कर आग से तू,
जफ़ा से जो बच गया, वफ़ा बेचिराख कर देगी तुझे।