
उम्र की शाम हो चली है हिचकियो के इंतजार में,
शायद अब वो कांधा देने ही आएगी जनाजे को मेरे।
या खुदा बस अब और एक बार मत तोड़ना मेरा दिल,
या फिर मयखाना बना देना एक कब्रिस्तान में भी।
My occasional poetic surge

उम्र की शाम हो चली है हिचकियो के इंतजार में,
शायद अब वो कांधा देने ही आएगी जनाजे को मेरे।
या खुदा बस अब और एक बार मत तोड़ना मेरा दिल,
या फिर मयखाना बना देना एक कब्रिस्तान में भी।