
हर शख्स सोचता है कि क्या था वो किसी की किताब में कही?
हालांकि खुद उसकी किताब में कुछ नाम रहे होंगे जरूर।
जिंदगी खड़े कर देती है ये सवाल उस वक्त,
जब उसकी किताब के बचे होते है सिर्फ चंद पन्ने।
ऐसा नहीं की हर किसी की किताब खाली ही रही हो,
न होती है कमी पन्नो की हर किसी की किताब में।
कही लिखी होती है शोहरत तो कही दौलत भी,
कई वो चीजे जो भाती है दुनिया की नजर को।
बढ़ भी चुकी होती है उसकी कीमत उस हर किताब से,
जो कभी इतराती थी पन्नो की चमक पर।
दुनिया की नज़र में शायद वो अमिर भी कहलाए,
पर खुदकी नज़र से अपनी गरीबी कोई छुपाए कैसे?