
बरसो बाद ये खबर आयी कि वो पीछे छूट गया,
तब कही अहसास हुआ उससे जुदा होने का।
एक कारवां जो साथ चलता था हर वक्त,
शायद उसकी सिसकियों को दबा देता था ।
अव्वल होता था वो खुद से दौड़ने की रेस में,
पर जिंदगी ने एक दिन रेस ही बदल दी ।
ला खड़ा किया उसे एक ऐसी रेस में
जहा दौड़ना था दुसरो के कंधो पर बैठ कर।
हरा कर उस रेस में जो उसकी ख्वाहिश ही न थी,
जिंदगी ने उसे मानो जितना ही भुला दिया जैसे।
टुटा जरूर था वो पर भागा नहीं रण छोड़कर,
गिरने के लिए उठ जाना जो सिख लिया था उसने।
अब जब मै वाकिफ हो गया उसकी जुदाई से,
एलान- ऐ -जंग तू नहीं मै करता हु ए जिंदगी।
वसूल करूँगा उसके हर खोये पल की कीमत,
दर्द जो महसूस करता हु मै उसका।
जिसे तूने मुझसे छीना था ए जिंदगी
वो कोई और नहीं मै खुद था।
ए जिंदगी बस अब एक वादा कर मुझसे
तू रण छोड़ नहीं भागेगी मुझे मेरे साथ देखकर।
Very inspiring . . . loke a Phoenix rising from ashes !
Thanks for sharing.
Regards
Bajrangdas Lohiya
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वाह, बहुत सुंदर |
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