
कुछ जख्म कभी भरते नहीं,
बस छुप जाते है वक्त की चादर तले।
उभरने के लिए यादो की आँधियो में,
जो थमती नहीं सांस रुके बिना।
कभी याद आ जाती है चिलचिलाती धुप
बरगद की छाँव में जहा कदम ठहर जाते थे।
कभी गरजते बादल और घनघोर बारिश,
जो रोक देती थी घर के बाहर निकलने से।
अजीब था वो जाडो का मौसम
जिसने सर्द कर दिया था रास्तो को।
बर्फ पर फिसलने से हुए जख्म
छुप गए थे फिर से उभरने के लिए ।
दर्द महसूस वो कराते है सिर्फ इसलिए,
की जिन्दा होने का अहसास बना रहे।
नासूर हो भले ही पर मरने नहीं देते
बड़े रहमदिल होते है ये जख्म।