
तेरी खशबू में बसे खत मै जला भी देता,
पर दिल में लगी आग बुझाता कैसे ?
गंगा में भला क्यों तेरे खत मै बहाता
मेरे अश्को का दरिया क्या कम था ?
जज्बात है ये खत, कोई सामान नहीं,
अश्को की बारिश से ताज़ा रखा है उन्हें।
और हा, हर अश्क लहू से सिचा है मैंने,
मैले न हो जाये तेरे खत यही सोचकर।