
अजीब नशा होता है हवा का,
शराब तो फिर भी सुबह उतर जाती है।
मिटा देते है दोनों ही फर्क होने और न होने में,
पर हवा तो बिन पिए ही चढ़ जाती है।
आसान होती है सवारी हवा की,
मुश्किल तो होता है गाड़े रखना पैरों को।
कौन मुकम्मल हुआ है हवा के सैलाब मे,
आना तो हर किसी को जमीं पर ही है।