
कौन कहता है कल एक होता है,
बिते भी कई होते है, और आने वाले भी कई।
कुछ कल होते है जो बस ठहर जाते है,
मानो सूरज ने उगना बंद कर दिया हो जैसे।
हलाकि हर रात के बाद सुबह होती है,
पर कुछ कटती है सालो में कुछ चलती है सदियों तक।
नहीं होना चाहिए ताल्लुक इस दरमियान के कल से,
जब रास्ते अंधेरो में तय किये थे।
पर रौशनी के लौटते ही उठ खड़े होते है सवाल,
याद आते है वो मोड़ जहा ठोकरे खायी थी।
दास्ता रास्ते के उतराव और चढाव की,
एक सिहरन पैदा कर देती है सीने में ।
बिता कल फिर आने वाले कल से डराता है,
अँधेरे की आशंका से ही दिल कांप जाता है।
ए मालिक क्यों तूने आज के दोनों ओर कल बनाये,
दोनों कल के बीच भला आज कैसे जिया जाये?