
ये ऐसा है वो वैसी है, आसानी से राय बना लेते है लोग,
खुद से अनजाने मगर गैरो की तस्वीर बना लेते है लोग।
जिन्हे कभी फुर्सत नहीं मिलती भीतर झाकने की,
अक्सर वो ही जुर्रत करते है बाहर ताकने की।
“आँखों देखि कानो सुनी” ने कइयों को गुमराह किया है,
इंसानो की छोड़ो इसने भगवान को तक दर्द दिया है।
कान वही सुन पाते है जिनमे आवाज़ होती है,
उन सिसकियों का क्या जो बेजुबान होती है ?
आँखों को देखने के लिए रोशनी जरुरी होती है,
पर सच्चाईया अक्सर अँधेरे की चादर ओढ़े सोती है।
इस जहाँ में लोग जानने को ही समझना मान लेते है,
हाँ ये वो लोग होते है जो सिने को ही दिल मान लेते है।