
आज मेरे घर पर भीड़ चढ़ आयी,
ये ‘उनकी’ नहीं, अपनों की भीड़ थी।
मैंने ही तो गाए थे कभी इनके गुणगान,
ना कहता था मै ये ही बचाएंगे हमें ‘उनसे’?
फिर भला क्यों ये घुसना चाहते है मेरे घर में?
अब ये किसे अपनी जगह दिखाना चाहते है?
किसको खतरा देखते है मेरे बेटो से?
या इन्हे एतराज है मेरी बेटी की मोहब्बत पर?
जो कुछ भी हो, मै बचाऊंगा मेरे बच्चो को,
पर कैसे? मुझे गुजरे बरसो जो हो चुके है।
क्या इसी दिन को देखने के लिए मै मरा था?
क्या अपनेपन के अहसास का सुकून झूठा था?
आज के कत्लेंआम का खून मेरे हाथो पर भी होगा,
गैर जिम्मेदार बाप होने का अहसास भी होगा,
सजा ऐ मौत से बदतर होगी सजा मेरी,
आज मेरी रूह को जो फांसी दी जाएगी।