
परायो को पहचानना तो आपने सीखा दिया,
अब अपना कौन है ये भी समझा देते।
मज़हब से तो वो अपने लगते है,
पर जात अलग होने की दुहाई देते है।
खुश हुए जब हम अपनी जात वालो से मिलकर,
तोड़ दिया दिल उन्होंने आमदनी पूछ कर।
हमारी त्वचा का रंग भी कुछ को नहीं भाया था,
त्वचा का ही नहीं हमारी कालर का रंग भी पराया था।
भाषाओ के परायेपन से बचने की कोशिश भी नाकाम रही,
कौन किस जगह से आया है भला भूलता है कोई?
हमारा घर था अपनेपन की खोज का अंतिम पड़ाव,
बेटा, बेटी और बहु के फर्क में यही तो मिला सबसे बड़ा घाव।
आप तो कह रहे थे थोड़ा सा बाटकर रुक जायेंगे,
इस काट छांट के बाद जो बचेंगे वो सब अपने हो जायेंगे।
पर अब ये हालात है की कोई भीनहीं लगता अपना,
बताइये ना ये सच्चाई है या बस एक सपना ।