
ऐ मालिक बस एक मेहेर कर दे,
वक्त के पहिये को घुमा दे थोड़ा पीछे।
कुछ है ऐसा जिसे फिर जीना चाहता हु,
और कुछ ऐसा जिसे चाहता हु थोड़ा बदलना।
लौटा दे मुझे वो हर रात सुबह का इंतजार करने के लिए,
वो हर दिन जब होती थी आस किसी का दीदार करने की।
दोस्तो की महफ़िल फिर जमेगी उसी मुकाम पर,
पर मेरा ध्यान बातो में कम उनके घर की ओर ज्यादा होगा।
होते ही उनके दीदार सोचुंगा थोड़ा और ठहरु या चल दू तेजी से
ये फैसला निर्भर होगा उनकी चाल पर।
यदि वो रुक जाये थोड़ी देर अपनी सहेलियों के साथ
कहूंगा अपने दोस्तों से इतनी भी क्या जल्दी है?
पर यदि वो जो निकल पड़े तुरंत,
तो दोस्तों से कह दूंगा यार जरा जल्दी में हु।
हा फिर मेरे दोस्त मुझे हरामी कहेंगे,
पर फिर भी ऐ मालिक तू मेरे दोस्त मत बदलना।
हर बार जब वो मुड़ेंगी तो रोंगटे भी खड़े होंगे,
पर इस बार मै घबराऊँगा नहीं मुस्कुरा दूंगा।
मेरे मुस्कुराने से मेरे दोस्तों के सीने चौड़े हो जायेंगे,
वो मुझे देखेंगी, पर इस बात पर मेरे दोस्त इतरायेंगे ।
होते ही उनका दीदार उनकी खिड़की में,
लगेगा चाँद आसमान से तो नहीं उतर आया?
थोड़ी देर ठंडक देकर फिर जब चाँद ओझल हो जायेगा,
एक सुस्त चाल के साथ मै घर का रुख कर लूंगा ।
फिर एक दिन हौसला जुटाकर रोक लूंगा कही,
कर लूंगा दिल की बात वो मानेगी कैसे नहीं।
बस मालिक एक बार घुमा दे वक्त के पहिये को उल्टा,
कुछ है ऐसा जिसे फिर जीना चाहता हु।