
दे दिया मैंने उसे सब कुछ ये सोच कर,
कि वो मुझसे बेपनाह प्यार करता है।
प्यार तो उसे सिर्फ अपने आप से था,
दुसरो का तो वो सिर्फ कारोबार करता था।
पर क्यों नहीं समझ पाया मै उस वक्त?
शायद आँखों में मेरे उसने लहू भर दिया था।
जिसे भी देखता सिर्फ काफिर ही नज़र आते थे,
छुपा कर चाँद को अमावस कर देने का हुनर जो था उसमे।
चिल्ला चिल्ला कर आगाह कर रहे थे कुछ लोग मुझे,
पर दिल जो लगा बैठा था मै उससे।
कानो को उसके हवाले करने का फैसला तो मेरा था,
उसकी मिठी बातो को इल्जाम देने से क्या फायदा।
हर छुअन में प्यार नहीं होता समझाया था माँ ने,
पर छूने से मदहोश होना ये मुकद्दर नहीं फैसला था मेरा ।
अब जब उसने औरो की तरह मुझसे भी सबकुछ छीन लिया,
तो जश्न मनाऊ दुसरो की बर्बादी का या शर्मसार हो जाऊ मै ?