
कई बार रिश्वत देकर देखी आईने को,
हर बार सिर्फ नाकामी ही नज़र आयी।
ऐसा भी क्या मांगा मैने,
कुछ दाग ही तो छुपाने की मिन्नत की थी।
अरे आईने कुछ सिख मेरी माँ से,
कितने जख्म छुपाती है मुझसे।
कभी नहीं कहती मै मिलने नहीं आया,
ज़माने को मेरी व्यस्तता की दुहाई जो देती है।
बहन भी नाज करती है मुझ पर,
मेरी हरकतों को पिताजी से छुपाती है।
राखी की लाज मै रखु या ना रखु
सबसे अच्छा भाई बताती है मुझे।
अरे आईने तुझसे तो अच्छी है मेरी पत्नी,
बिना मुख़ौटे कभी बाहर निकलने नहीं देती।
छुपा देती है मेरे अंदर के रावण को,
श्रृंगार ही वो कुछ ऐसा करती है।
उसके पिता जैसा कोई नहीं
ये कहकर मेरी बेटी इतराती है।
भूल जाती है वो हर उस फरक को,
जो मैंने उसमे और उसके भाई में किया।
अरे आईने हर बार सोचकर तेरे सामने खड़ा हो जाता हु,
की शायद कभी तो तस्वीर बदल देगा।
पर तू है की हर बार मुझे मुझसे मीला देता है,
क्या करू बता? बदल दू अपने आप को या तोड़ दू तुझे?