रुह

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उनके न मिलने का रंज करू,

या मनाउ जशन उन सुनहरी यादो का?

इजहार ऐ मुहब्बत हमने न की थी,

तो गुनहगार उन्हें ठहराऊ कैसे?

मुझे अपने होने का पहला अहसास जिसने कराया,

ज़माने की भीड़ में जिसने मुझे अपने आप से मिलाया ।

उससे शिकवा करू इतना मै खुदगर्ज़ नहीं,

उनकी जगह सजदे में है, मै भूल जाऊ कैसे?

बाहो में भर लेना मंजिल नहीं मुहब्बत की,

वो तो अहसास है जो रूह के हर कतरे में उतर जाता है।

किसी ने गर वो अहसास कराया,

तो उसका यह क़र्ज़ चुकाऊ कैसे?    

फासले तो होते है केवल जिस्मो में ,

रूह तो हमेशा साथ होती है। 

फिर क्या मिलना और क्या बिछड़ना,

पर ये अपने दिल को समझाऊ कैसे?

Published by Vasant V. Bang

I am a human being with all shades and imperfections. A management educator and advisor by profession I realized pretty late in life that my true calling is expression of human feelings, and hence this blog.

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