
मास्क पहनने के लिए वायरस को क्यों बदनाम करते हो,
बिना मास्क हम जी ही नहीं सकते, कहने से क्यों डरते हो।
भीतर के बच्चे को छुपाने के लिए ‘बडे’ हो जाने का मास्क आता है,
कोई ज़िन्दगी भर नादान बना रहे ज़माने को कहा सुहाता है।
पहले बेटा, फिर पति, फिर बाप वाला मास्क पहन लिया,
अब तो हालत यह है की आईने ने भी हमें पहचानने से इंकार कर दिया।
सिर्फ एक मैखाना ही है जहा हम बगैर मास्क नज़र आते है,
इस लिए तो जाम और साकी का क़र्ज़ कभी नहीं चूका पाते है।