चका चौंध सबकी होती है,
सवाल सिर्फ होता है: कैसे और कब।
कोई चमकाता है बाप के नाम और दाम से,
कोई चमकता है खुद के काम से।
जब कुछ इतराते फिरते थे पुश्तैनी दम पर,
तक़दीर बनाने का जिम्मा था खुद हम पर।
किसी रोज हमारी साईकिल को एक मोटरबाइक ने क्या हरा दिया,
गुस्से में आकर हमने बाइक चलाना छोड़ बनाना ही सिख लिया।
जब मोटरबाइक चमकाया करते थे कई,
हमें लगता था इंजिन डिज़ाइन सीखने चक्कर में हमारी जवानी बेकार ही गयी।
जब कॉलेज में हम किसी को बाइक पर नहीं बिठा पाए,
तो ठान लिया करीयर की शुरुवात बाइक बनाने वाली कंपनी से ही की जाए।
मंज़ूर न था हमें की चमकने के लिए किसी और के कंधो पर खड़े हो,
हमेशा चाहते थे हमारी मंज़िल के पैर हमने खुद घड़े हो।
दुनिया हमें अपने नाम से जाने यही था एक सपना,
आज मंज़िल ही नहीं मुकाम भी है अपना।
उस वक्त चमकने वाले आज भी उन्ही गलियों में घूमते है,
अपनी पुरानि शान की निशानिया ढूंढते है।
आज देख कर हमें शायद आपको यूं लगे की हम अब इतराएँगे,
मगर गौर से देखिये आज भी हमारे पैर आपको ज़मीं में गड़े नज़र आएंगे।